Saturday, April 29, 2017

रश्क हुआ जाता है

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मेरा मानना है कि सुविधा संपन्न लोगों के लिए अनभिज्ञता विलासिता है| सुखी रहने का सार भी शायद इसी में निहित है|

कुछ महीनों पहले मेरी एक सहेली ने पूछा था "ये जीमेल क्या होता है?" उसकी अनभिज्ञता पर रश्क हुआ था| 

कुछ दिनों पहले मैंने दफ्तर की एक लड़की से पूछा "तुम्हारी हॉबी क्या है?"
जबाब मिला "ऑनलाइन शॉपिंग"
मैंने कहा कि यह तो आज की तारीख में हम सभी कमोबेश करते ही हैं| फिर मैंने उसे उदाहरण देते हुए पूछा "मान लो दफ्तर में छुट्टी है और घर पर भी अकेली हो और इन्टरनेट डाउन है, क्या करोगी"
जबाब मिला "ऑफ़लाइन शॉपिंग"
मुझे हँसी भी आई और उस पर प्यार भी | रश्क भी हुआ कि उसने सिलाई, गाने, लिखने-पढ़ने, घर सजाने जैसा कोई काम शौक में शुमार नहीं किया| दिल्ली में रहते हुए एक साल हुआ है और उसे सिर्फ कनाट प्लेस और मयूर विहार पता है| अगले महीने नॉएडा शिफ्ट करेगी| 

मैंने पूछा "किस सेक्टर में"
जवाब मिला "मेरे पति को पता है| उन्होंने देखा है| उन्होंने तो किसी मूवर्स और पैकर्स वाले से भी बात कर ली है"
"अच्छा किया, कौन सा मूवर्स और पैकर्स?"
"मेरे पति को पता है|"

मैंने आगे उससे कुछ नहीं पुछा| पूरे यकीन के साथ कह सकती हूँ कि उसे सीरिया या फिलिस्तीन समस्या के बारे में भी कुछ पता नहीं होगा| उसे न तो बस्तर में आदिवासियों के साथ हो रही घटनाओं से कुछ लेना देना है और न ही कुपवाड़ा में मारे गए सैनिकों से | उसे तो यह भी पता न होगा कि एमसीडी चुनाव में क्या हुआ| ऑनलाइन शॉपिंग किया और खुश हो लिए | कनाट प्लेस गए, खादी से कुर्ता खरीदा और खुश हो लिए | उसके दुखों में शुमार है कमरे के एसी का ठीक से काम न करना या ठण्डे पेयजल का उपलब्ध न होना |  उससे बस रश्क हुआ जाता है| 

हम भी तो उसकी तरह अपनी एक दुनिया बना सकते थे जहाँ देश-विदेश और समाज के गम सेंध नहीं लगा पाते| अपनी खुशियाँ और अपने गम हम परिभाषित करते| हमसे हो न सका और अब हम कर ही क्या सकते हैं सिवाय रश्क करने के |

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