Sunday, June 4, 2017

देवी

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जब जागी देवी योगनिद्रा से 
किया नदी में स्नान, पाँव में लगाया आलता 
कर रहे थे श्रृंगार मुक्त केशों का नदी के जलबिंदु 
बतास में घुली थी एक नूतन गंध 
आँखों में डाल अंजन, माथे पर लगाया कुमकुम
और चढने लगी सीढियां मंदिर की 

कुल पाँच सीढ़ी चढ़ उतर आई उलटे पाँव 
लिए मंद मुस्कान अधरों पर 
लिखा था प्रवेश द्वार पर मंदिर के 
रजस्वला स्त्रियों का प्रवेश वर्जित है 

जिसे तुम खड्ग कहते हो 
वह प्रश्न चिन्ह है देवी का 
कि है वह कौन जो रहती है 
मंदिर के अंतरमहल में 
फिर भी रह जाती है अपरिचित ही 
करते हो किसे तुम समर्पित फिर 
यह क्षुद्र देह्कोष और रक्तबिंदु 
देवी क्या केवल पाषाण की एक मूरत भर है ??

Sunday, May 28, 2017

महमूद नोमान की कविताएँ

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  1. घुन कीट


देखा था वरुण ने जिस दिन
माँ को लौटते हुए पतितालय से
यतीम हो गयीं थीं अनायास बातें |

धानवती जमीन के बीचोबीच बराबर
करता रहा था चहलकदमी
दिक् विहीन
शून्यता की परिव्राजक होकर |

उस दिन से हैं दोनों आँखें नदी
हैं धान की बालियों पर ओस की बूँदें
बजता रहा है ह्रदयपिंड का घंटा रह-रहकर |

प्रतिदिन के सूरज डूबने की कसम
इस शरद के अंत में
उड़ जायेगा साइबेरियन पक्षी के संग
दूर, बहुत दूर |



ঘুণপোকা

মাকে যেদিন পতিতালয় থেকে আসতে
দেখেছিল বরুণ -
কথারা অমনি এতিম হয়ে গিয়েছিল।
ধানবতী জমির মাঝ'খান বরাবর
হেঁটেছিল দিনভর,
দিকবিহীন
শূন্যতার পরিব্রাজক হয়ে।
সেদিন থেকে দু'চোখ নদী-
ধানের শীষে শিশির কণা
হৃদপিণ্ডের ঘণ্টা বাজে থেমে থেমে।
প্রতি দিবসের সূর্য ডোবার কসম,
এই শীতের শেষে
সাইবেরিয়ান পাখির সাথে উড়ে যাবে

দূরে,অনেকদূর।



  1. बिजूका

केले के बरक में है लगा प्रेमिका का खून
राम चिरैया के होठों में जलता है दोपहर
प्रेम के मशाल में सूर्य की हँसी है फीकी
और दांत से काटकर खा रहे हैं अन्तर्वयन लोग
दब-दबकर स्वतःस्फूर्त, सद्य बोया गया फसल
मैदान का है जाय-नमाज |

लौट गयी निर्मित आत्मा, खुशबू
निगलकर वहशत की हूर परियों को    
झूठे संसार में हर कोई कहे,
बिजूका, बिजूका.....


কাকতাড়ুয়া

কলার বরকে প্রেমিকার রক্ত
মাছরাঙার ঠোঁটে জ্বলছে দুপুর।
প্রেমের মশালে সূর্যের হাসি ফিকফিকে,
এবং কুরে খাচ্ছে অন্তর্বয়ন মানসগুলি
গুমরে গুমরে স্বতঃস্ফূর্ত,সদ্যপোঁতা
ফসল মাঠের জায়নামাজ।
নির্মিত আত্মা ফিরে গেলো,খুশবু
গিলে বেহেশতের হুরপরীদের-
মিছে সংসারে সবাই বলুক,
কাকতাড়ুয়া, কাকতাড়ুয়া......

  1. बारिश का तथ्य अनावरण 

आक्रांत बारिश के प्याले में
चुस्कियों में सन्यासी
हर सावन मनाता है उत्सव आनन्द का
भीगों देता है बारिश का पजामा |

ढ़लती हुई सांझ है यह घर
इस घर की चहलकदमी के बाद
पोखर में कर स्नान
काला कौआ बैठकर खूँटे के तार पर
झांकता है झोले के भीतर!

বর্ষার তথ্য ফাঁস

আক্রান্ত বৃষ্টির পেয়ালায়
চুমুকে সন্ন্যাসী-
প্রতি শ্রাবণে মাতলামি করে,
ভিজিয়ে দেয় বর্ষার পাজামা।
উতরানি সন্ধ্যায় এ ঘর
ঐ ঘর পায়চারি শেষে,
পুকুরে স্নান করে
দাঁড়কাক খুঁটির তারে বসে
উঁকি মারে ঝলির ভেতর!



  1. लोजेंस कहानी

रिक्शा के हुड को उठाकर
प्रेम और कुहाशा गले मिल
पार कर गए ईटों से बना रास्ता |

है एनर्जी सेविंग्स बल्ब के शहर में
कालाचान के दरगाह के रियासत में
जज्बा से मजलूम मोम का ट्रे और
निद्राहीन जंग लगा दीपक |

चूस रही है पलाश के भोर में लाश की मक्खी
चालीस कदम फाँदकर दूध की कटोरी
माथे ऊपर कुरआन को उठाकर लिख रही है
प्रेम का हलफनामा, शरीफ अली की बेटी- पॉपी
श्री इच्छामती के बरामदे में, इन्द्र्पुल के पूरब में |

লজেন্স কাহিনী

রিকশার হুড তুলে ভালবাসা কুয়াশায় গলাগলি
করে ইটের রাস্তা পেরিয়ে গেল।এনার্জি সেভিংস
বাল্বের শহরে-কালাচাঁনের দরগা ভিটেয় জজবা
হালে মজলুম মোমের ট্রে-নিদ্রাহীন মরিচে বাতি।

পলাশের ভোরে লাশের মাছি চল্লিশ কদম ডিঙ্গে
 দুধের বাটি শুষছে।শরীফ আলীর তনয়া - পপি
কুরআন মাথায় তুলে প্রেমের হলফনামা লিখছে-

শ্রী ইছামতির দাওয়ায়-ইন্দ্রপুলের পুবে।

  1. 5. पालविहीन साम्पन

    नदी के सिरहाने मेघ हत्या की संध्या  
    कामुक हो उठती हैं बारिश की सखियाँ
    खोल देता है साड़ी की तह
    जलवाही जहाज, बसंत के वक्ष पर

    बह गया था मैं पालविहीन साम्पन में

    (*साम्पन:- लघु नौका)


    বৈঠাবিহীন সাম্পান

    নদীর সিথানে মেঘহত্যার সন্ধ্যাতে
    বৃষ্টির বান্ধবীরা কামুক হয়ে যায়
    পণ্যবাহী জাহাজে সারেঙের বুকে
    খুলে দেয় শাড়িটির ভাঁজ -

    আমি ভেসে ছিলাম বৈঠাবিহীন সাম্পানে।

    मूल कविता :- महमूद नोमान (बांग्लादेश के कवि )

    अनुवाद :- सुलोचना 

    Saturday, May 27, 2017

    माया के प्रलोभन में

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    वे समुद्र से पलायन कर आए हुए लोग हैं,
    वह सागर है - 'अर' !

    या वह कर आए हैं पलायन 
    सोमरस-स्रावी उस पीपल की छाया से 
    माया के प्रलोभन में !

    अभेद यह जगत !

    क्या दिन क्या रात जलती है रौशनी सदा ही 
    इहकाल परकाल सब एकाकार 
    स्निग्ध, सर्पगंधा, नभोनील चाँद तैरता है हृदयाकाश में 
    मायारूपी रौशनी झड़-झड़ जाती है 
    देते हैं आहुति उस रौशनी में जीवकुल पशुकुल सभी 
    आहुति से होती है सृष्टि धुंएँ की 
    धुंएँ से मेघ, मेघ से बारिश की !
    आलोकमेघ ! पुष्पवर्षा !
    बारिश से पैदा होता है अनाज 
    साल दर साल लौट आता है साल 
    कट जाता है अनंत चन्द्रमास धराधाम में 
    भरी पूर्णमासी में - न ही आहार, न ही तंद्रा, न ही निंद्रा 
    विभ्रांत मनुष्य कुल, करता रहता है इकट्ठा अनाज पृथ्वी पर हमेशा

    मूल कविता :- चंचल बशर (बांग्लादेश के कवि )
    अनुवाद :- सुलोचना 

    মায়াপ্রলোভনে 
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    তারা সমুদ্র থেকে পালিয়ে আসা মানুষ,
    সেই সাগর --'অর'!

    কিংবা তারা পালিয়ে এসেছে 
    সোমরসস্রাবী সেই অশত্থের ছায়া থেকে 
    মায়াপ্রলোভনে !

    অভেদ এ জগৎ !

    দিন নাই রাত নাই সদাই রৌশন জ্বলে!
    ইহকাল পরকাল সব একাকার 
    স্নিগ্ধ, পুষ্পগন্ধা, নভোনীল চাঁদ ভাসে হৃদাকাশে 
    মায়ারুপ আলো ঝুরে ঝুরে পরে 
    সেই আলোতে আহুতি দেয় জীবকূল পশুকুল যত 
    আহুতি থেকে সৃষ্টি হয় ধূম 
    ধুম থেকে মেঘ, মেঘ থেকে বৃষ্টি !
    আলোকমেঘ ! পুষ্পবৃষ্টি !
    বৃষ্টি থেকে জন্ম নেয় শস্য 
    বছর ঘুরে ঘুরে বছর  আসে 
    অনন্ত চন্দ্রমাস কেটে যায় ধরাধামে 
    ভরা পূর্নিমায় - আহার নাই ঘুম নাই নিদ্রা নাই 

    বিভ্রান্ত মনুষ্যকুল , চিরকাল পৃথিবীতে শস্য কুড়ায়

    Saturday, April 29, 2017

    रश्क हुआ जाता है

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    मेरा मानना है कि सुविधा संपन्न लोगों के लिए अनभिज्ञता विलासिता है| सुखी रहने का सार भी शायद इसी में निहित है|

    कुछ महीनों पहले मेरी एक सहेली ने पूछा था "ये जीमेल क्या होता है?" उसकी अनभिज्ञता पर रश्क हुआ था| 

    कुछ दिनों पहले मैंने दफ्तर की एक लड़की से पूछा "तुम्हारी हॉबी क्या है?"
    जबाब मिला "ऑनलाइन शॉपिंग"
    मैंने कहा कि यह तो आज की तारीख में हम सभी कमोबेश करते ही हैं| फिर मैंने उसे उदाहरण देते हुए पूछा "मान लो दफ्तर में छुट्टी है और घर पर भी अकेली हो और इन्टरनेट डाउन है, क्या करोगी"
    जबाब मिला "ऑफ़लाइन शॉपिंग"
    मुझे हँसी भी आई और उस पर प्यार भी | रश्क भी हुआ कि उसने सिलाई, गाने, लिखने-पढ़ने, घर सजाने जैसा कोई काम शौक में शुमार नहीं किया| दिल्ली में रहते हुए एक साल हुआ है और उसे सिर्फ कनाट प्लेस और मयूर विहार पता है| अगले महीने नॉएडा शिफ्ट करेगी| 

    मैंने पूछा "किस सेक्टर में"
    जवाब मिला "मेरे पति को पता है| उन्होंने देखा है| उन्होंने तो किसी मूवर्स और पैकर्स वाले से भी बात कर ली है"
    "अच्छा किया, कौन सा मूवर्स और पैकर्स?"
    "मेरे पति को पता है|"

    मैंने आगे उससे कुछ नहीं पुछा| पूरे यकीन के साथ कह सकती हूँ कि उसे सीरिया या फिलिस्तीन समस्या के बारे में भी कुछ पता नहीं होगा| उसे न तो बस्तर में आदिवासियों के साथ हो रही घटनाओं से कुछ लेना देना है और न ही कुपवाड़ा में मारे गए सैनिकों से | उसे तो यह भी पता न होगा कि एमसीडी चुनाव में क्या हुआ| ऑनलाइन शॉपिंग किया और खुश हो लिए | कनाट प्लेस गए, खादी से कुर्ता खरीदा और खुश हो लिए | उसके दुखों में शुमार है कमरे के एसी का ठीक से काम न करना या ठण्डे पेयजल का उपलब्ध न होना |  उससे बस रश्क हुआ जाता है| 

    हम भी तो उसकी तरह अपनी एक दुनिया बना सकते थे जहाँ देश-विदेश और समाज के गम सेंध नहीं लगा पाते| अपनी खुशियाँ और अपने गम हम परिभाषित करते| हमसे हो न सका और अब हम कर ही क्या सकते हैं सिवाय रश्क करने के |

    Saturday, April 8, 2017

    कष्ट

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    सुनो नताशा, 
    न करो धारण अपने कष्टों को आभूषणों की तरह 
    छुपा लो गड़े खजाने की तरह उन्हें, 
    नहीं तो मुश्किल में पड़ोगी

    धो डालो यथाशीघ्र अपनी उँगलियों के पोरों पर जमे नक्षत्र-विषाद
    नहीं तो जान लो नताशा, आएगा कोई राक्षस भिक्षुक के वेश में 
    तुम्हारे कष्टों को तो नहीं ही हरेगा, तुम्हें छल जाएगा 
    पौराणिक महाकाव्यों में उल्लेख है ऐसी कहानियों का

    ठहरो नताशा, मत उगलो अग्निवर्षा करते शब्दबीज 
    जिससे जल जाए तुम्हारे घर का दक्षिण दुआर 
    जो संयोगवश प्रवेश द्वार भी है तुम्हारे घर का 
    संभलो कि यह तमाशबीन समय है 
    जानती तो हो न नताशा,  घर छोड़कर वन को निकली स्त्रियाँ 
    भैरवी ही बनती हैं, बुद्ध नहीं बनती कदापि 

    याद करो नताशा कि तुम्हारी माँ ने कहा था प्रेम नहीं करना 
    कर सीता से यशोधरा तक का उल्लेख, कहा था
    अत्यंत सुंदर स्त्रियों के भाग्य में प्रेम नहीं होता  
    माँ के मुख से निकली बात किसी मंत्रोच्चार से कम तो नहीं होती नताशा
    फिर कौन सा मुँह लेकर कहोगी कि वो जो रिश्ता था, अब रिसता है|

    देखो नताशा, तुम्हारी खंडित स्मृतियों की परिक्रमा करता है शब्दयान 
    और तुम्हें घेरे बैठी हैं कई दुर्लभ कवितायेँ 
    तो करो प्रतिज्ञा कि नहीं पढ़ोगी प्रेम की आयूहीन कविता आजन्म 
    हृदयहीन समाज की धिक्कारसभा में 

    सुनो नताशा, 
    यदि अपने दुखों के रंगों में रंग नील-बसना ही बनना है 
    तो आसमान बन जाओ, करो अपने व्यक्तित्व का विस्तार अपरिमित 
    किसी की छत बन जाओ, सजा लो कष्टों को बना सूरज, चाँद और तारे 
    करो वृष्टि स्नेह की, जब दिल भर आये 

    चलो, उठो नताशा, बहुत दूर जाना है 
    और देखो आसमान की ओर सर उठाकर, कहीं कोई करुणाधारा नहीं है 
    पर याद रहे नताशा,  न करना उल्लेख प्रेम या स्वाधीनता का कभी
    कि मानवता की पृष्ठभूमि पर फूटता है कष्ट का झरना इन्हीं दो पर्वतों से 

    सुनो नताशा, 
    न करो धारण अपने कष्टों को आभूषणों की तरह 
    छुपा लो गड़े खजाने की तरह उन्हें, 
    नहीं तो मुश्किल में पड़ोगी

    Sunday, March 12, 2017

    फ़िदा हुसेन का घोड़ा

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    अपने ख्वाबों की बदलती ज्यामिति पर
    जिसे बन जाना था पाइथोगोरस सा 
    और गढ़ने थे जिसे नित्य नए प्रमेय 
    मैंने देखा है खुली आँखों से उस शख्स को 
    बदलते हुए अनगढ़े ख्वाबों को रंगों में,
    फिर उन रंगों को बदलते कैनवास पर 
    बिखरी हुई आड़ी-तिरछी लकीरों में,
    बदलते देखा है उन लकीरों को फिर 
    अलग-अलग ज्यामितीय आकारों में, 
    देखा फिर ज्यामितीय आकारों को 
    बदलते हुए एक मुकम्मल आकृति में 
    देखा है इन आकृतियों को कई बार बनते घोड़ा
    कभी रंगीन तो कभी श्वेत-श्याम रंगों में 
    और इस प्रकार फ़िदा हुसेन की तूली से गुजरकर 
    अनगढ़े ख्वाबों को घोड़ा बन दौड़ते कैनवास पर 
    कई बार मैंने देखा है खुली आँखों से

    यदि लगता है आपको कि मर गए हैं आपके ख्वाब 
    यदि लगता है आपको कि ख्वाब अब बचे ही नहीं 
    यदि लगता हो आपको कि ख्वाब जैसा कुछ था ही नहीं कभी 
    तो जागकर शून्यता के ध्यान से देखिये फिदा हुसेन के घोड़े को 
    जो देखता है मुड़-मुड़ कर पीछे अलग-अलग रंगों में 
    आगे बढ़ते हुए क्या देखा है आपने कभी मुड़कर अपने छूटे हुए ख्वाबों को ?

    आप देखेंगे कि हमारे अपने ही ख्वाबों का चित्रांतर है फिदा हुसेन का घोड़ा 
    जिसे स्पर्श कर पाने के लिए दरकार है अंतर्दृष्टि की 
    जिसके शरीर से एक ज्यामितीय आकार निकालकर रख लेना चाहता है मन 
    फिदा हुसेन के घोड़े की नाल में दिखता है मस्तुल हमारे ख्वाबों की नौका का

    फिदा हुसेन का घोड़ा जो दिखता है कैनवास पर पीछे मुड़कर देखता 
    बना है ज्यामितीय आकारों से और हर आकार का है अपना एक कैनवास 
    मंचन हो सकता है उस हर एक कैनवास पर हमारी ख्वाबों के पसंद के किसी नाटक का 
    जिसे देखकर पता चलता है कि होता है कितना जरूरी ख्वाबों को आकार देना !

    हम जब भी देखते हैं कोई ख्वाब, हमें देखना चाहिए फिदा हुसेन के घोड़े को 
    जो देखता है मुड़-मुड़ कर पीछे बारबार, आगे दौड़ते हुए भी पूरे सामर्थ्य के साथ 
    कि मन को चाहिए होती है अथाह हॉर्स पावर शक्ति आगे बढ़ते रहने के लिए 
    और आकार देने के लिए पीछे मुड़ कर देखते हुए अपने छूटे हुए अनगढ़े ख़्वाबों को






    Monday, March 6, 2017

    बस इक आशा

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    गाढ़े नीले रंग की स्याही में है दर्ज़
    मस्तिष्क की तंत्रिका कोशिकाओं में तैर रही दमित स्मृतियाँ 
    जिन्हें विस्मृत करने के अभ्यास में किए जा रही हूँ कंठस्थ 
    अब भी आच्छादित है जिन पर रक्त अक्षत अच्छे दिनों के अनुष्ठान का 

    धरने पर है अनुच्चारित शब्दों का जुलूस
    ध्वनि के द्वार पर, नीरवता में लीन
    कोई जाप या मंत्रोच्चार नहीं, है बस इक आशा 
    कि सुनाएगा कभी जीवन पियानो बीथोवन की नाइन्थ सिम्फ़नी

    समयपुरुष पोंछ देता है उन तमाम स्नेहसिक्त आँखों की अनुभूतियों को 
    जो कर सकता था काम मलहम का मेरी वेदना पर  
    अबाध्य मन जा रहा है दंडकारण्य की ओर
    है बस इक आशा कि लौट आएगा अच्छे दिनों का प्रवासी पक्षी 

    अवकाश पर हैं धरती के समस्त देवी-देवता इन दिनों 
    कि विलीन हो जाती हैं समस्त प्रार्थनाएँ निर्वात में 
    है बस इक आशा कि आएगा कोई पैगम्बर वक़्त का 
    और करवाएगा मेरा साक्षात्कार अच्छे दिनों के देवता से