Friday, February 17, 2017

फ़ूड फ़ूड

न जाने आजकल एपिक चैनल को क्या हो गया है, जब भी टीवी ऑन करती हूँ, "महाभारत" आ रहा होता है| ऐसे में एक ही चैनल रह जाता है देखने लायक - "फ़ूड फ़ूड"| इस चैनल को देखते हुए जीवन के सारे लक्ष्य बेकार लगने लगते हैं और बढ़िया खाना खाना; फिर खाते रहना ही जीवन का एकमात्र लक्ष्य लगने लगता है| कैलोरीज की बातें करने वाले संसार के सबसे क्रूर प्राणी लगते हैं| 

Thursday, February 16, 2017

नदी की आत्मकथा

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जब लौट आयी मैं कोलकाता के बाबुघाट से 
तो देखा नदी ने लिख दी थी अपनी आत्मकथा 
मेरे दुपट्टे के किनारों पर अपने जल से 

पढ़ रही हूँ आत्मकथा नदी की इन दिनों 
तो उतर रही है एक नदी मेरे भीतर भी 
नींद की नौका अक्सर ले जाती है मुझे हुगली पार 

लौटने से महज कुछ घंटों पहले भी गयी थी घाट पर 
जब फिसलकर गिरी थी सीढ़ियों पर घाट के 
मेरी आँखों से छलका जल जा मिला था नदी में 
और चखा था नदी ने मेरे दुखों का स्वाद 

अब कुछ बूँद बनकर बह रही हूँ मैं भी नदी के साथ 
साझा है यात्रा में हमारा परस्पर अन्तर्जलीय दुःख 
नदी महज नदी नहीं, एक प्रान्त है, हर लहर उसका जनपद 

निकल जाना चाहती थी बैठ डिंघी में किसी रात निरूद्देश 
जैसे बहता रहता है नदी पर केले के पत्ते पर रखा नैवैद्य 
कौशिकी अमावश्या की अगली सुबह काली पूजा के बाद 

किया है नालिश अपनी आत्मकथा में नदी ने धर्म के ठेकेदारों का 
कि उनके व्यर्थ के कर्मकाण्ड का बोझ सहना पड़ता है उसे 
और लिए धरती का कचड़ा वह कूद रही है समंदर में  
कर रही है वह कई सदियों से प्रायोजित आत्महत्या इस प्रकार

किंकर्तव्यविमूढ़ नदी नहीं दे पायी जवाब आज तक 
भूपेन हजारिका के गीत का 'ओ गंगा बहती हो क्यों'
तैरता है गंगा का संगीत हुगली के पानी में 
गंगा का स्थायी है, अंतरा हुगली का 

करती हूँ नदी को याद मैं इतना इन दिनों 
नहीं किया होगा भगीरथ ने भी स्मरण उतना गंगा का 
धरती पर होने के लिए अवतरित 
लम्बी होती है आत्मकथा हमेशा ही किसी मन्त्र की अपेक्षा  

बाबुघाट के सुनहले जल पर खूब दमक रहा था आसमान 
उसी आसमान में विचरता है मेरी स्मृतियों का राम चिरैया 
उस राम चिरैया के होठों के बीच है दबा हुगली का संसार 
उस संसार पर शोध कर रहे हैं इन दिनों देश के वैज्ञानिक 

मेरी स्मृतियों के पाँव सने हैं हुगली की रेत में अब भी 
जबकि मैं बैठी हूँ देश की राजधानी के पास छोटे शहर में 
जहाँ सिटी पार्क में बैठ किसी नीलकंठ को सूना रही हूँ 
नदी की आत्मकथा; नीलकंठ सुनता है, कुछ नहीं कहता  

एक रात नींद की नौका पर सवार मैं फिर उतरी हुगली पार 
नदी के जल को छूकर पूछा "तुम्हें ठीक किस जगह दर्द है'?
नदी ने कहा इशारों में - रेत पर, सुन्दरी के पेड़ों की जड़ के पास 
बची हुई हिलसा मछलियों की छटपटाहट के ठीक मध्य

हुगली के दुःख से मलिन है बांग्लादेश की पद्मा 
पद्मा की हिलसा मछली गाती है हुगली की हिलसा का विरह 

गंगा का कोई मजहब नहीं है 
हिन्दू हो या मुसलमान, मिटाती है प्यास सभी की 
नहा सकता है कोई भी इसके जल में 
और यह बनी रहती है पवित्र 
नहीं लिखा गया कोई मन्त्र इसके शुद्धिकरण के लिए 

लौट ही रही थी मैं कि मेरे पाँव पखारती नदी ने कहा 
"बचा लो मुझे, जो करती हो प्यार, मुझे रहना है जिंदा"
देखा मैंने शहर की गंदगी को नदी में मिलाते नलिका को 
क्या कहती, चुप ही रही और खूब हुई शर्मिंदा 

उसी क्षण पढ़ा था मैंने मोबाईल में अंतर्जाल पर 
जल प्रदुषण पर हुए शोधों के विषय में 
और पाया था कि खेल रहे हैं जल वैज्ञानिक 
पृथ्वी पर कबड्डी का खेल अन्धकार में  

गैर सरकारी संगठन बेच रहे हैं दुःख अलग-अलग मंचो पर 
कि नदी का दुःख ही है उनका प्रिय व्यवसाय 
हम किए जा रहे हैं प्रदुषण से प्रणय 
और किए जा रहे हैं वहन प्रदुषण प्रणय के साथ 

बता रहे हैं सुंदरवन से चलकर कोलकाता तक पहुँचे सुन्दरी के पेड़ 
कि जान्हवी इन दिनों लौटना चाहती है स्वर्ग 
धरती पर जान्हवी जहन्नुम की साक्षी है !

रोती है गंगा आलमगीर मस्जिद के बाहर; अल्लाह नहीं सुनते 
बिलखती है हुगली कालीघाट पर; देवी रहती है मौन

कर तपस्या भगीरथ ने गंगा को बुलाया था धरती पर स्वर्ग से 
धरती के हम मानव मानवियों का श्रम उसे बना न डाले "स्वर्गीय" !!

नींद की नौका, जो ले गयी थी मुझे बाबुघाट पर हुगली किनारे 
छोड़ गयी है मुझे भोर की छोड़ पर 
अनुसरण करते हुए सूरज की स्वर्ण रेखाओं का 
घेर रखा है एक अपरिचित मौन ने मुझे इन दिनों 
कि नदी ने अपनी आत्मकथा में छोड़ रक्खे हैं कुछ पन्ने रिक्त !

Monday, February 13, 2017

शाम्भवी योग

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किसी  रक्तपूर्णिमा की रात 
मेरे अभिधान से झड़े थे कुछ शब्द
विषाद के रंग में सने  
रोप आयी थी उन्हें मैं घर के दक्षिण दुआर पर 
कि कहा था पिता ने विदाई से ठीक पहले 
नहीं दिखाना कभी किसी को अपना दुःख 

डाला मेरे दुखों पर बारिश ने पानी और रौशनी सूरज ने
जब बदला करवट मौसम ने और चली बसंती हवा 
उग आया पेड़ मेरे दुखों पर, खिला जिस पर रक्त जवा 

चढ़ा रहें है पत्थर के महादेव को रक्त जवा 
आजकल, मेरे ही असीम दुखों के अधिष्ठाता
मेरे अश्रुजल से हो रहा है उनका जलाभिषेक 

मौन हैं देवता, चुप हूँ मैं भी 
खुली हैं आँखें हम दोनों की 
और कुछ देख भी नहीं रहे 
शाम्भवी योग कहते हैं जिसे

देवता ढूँढ रहे हैं सूत्र 
मनुष्य होने का, योग द्वारा 
कि समझ सकें इंसानों के तुच्छ दुःख 
मैं हूँ प्रतीक्षारत कि न जाने लगेंगे कितने कल्प 
मुझे पत्थर हो जाने में !!

समझना चाहती हूँ मैं देवताओं की विवशता !

Sunday, February 12, 2017

साथ चलना

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चल पड़ी थी मैं किसी गोधूलि बेला में तुम्हारे साथ 
कर प्रतिवेश के विधिनिषेध की देहरी को पार 
कि तुम्हारे साथ चलना था किसी सृष्टिसुख में होना 

ठीक जैसे हमारा परस्पर दुःख नहीं छोड़ता हमें अकेला 
जो चलते हम कुछ और कदम साथ
तो शायद नियति रचती कुछ और ही खेला 

नियति दुविधा में थी हमारी ग्रहण-योग्यता को लेकर 
या तुम भांप चुके थे गति का विधान 
प्रणय अभ्यास में तुम समय के साथ रहे  

चल रही हूँ इन दिनों मैं अकेली आस्तित्व के साथ 
बेकल करता है स्मृतियों का निःशब्द तुषारापात 
जीवन बीत रहा है जैसे निष्प्रदीप एक रात 

मालूम तो नहीं मुझे ठीक जा रही हूँ किस ओर 
क्यूँ करूँ चिंता मैं गंतव्य के दूरियों की अब 
जब चलती ही जा रही हूँ अहर्निश स्व-विभोर

Saturday, February 11, 2017

खाली बर्तन सा रिश्ता

आसपास के किसी घर में, जब किसी के हाथ से कोई खाली बर्तन गिर जाता है, तो देर तक वह आवाज हमारे कानों में गूँज रही होती है और हमें यह आवाज परेशान करती है| यही बात रिश्तों के साथ भी है| रिश्ता किसी का भी टूटता है, तो दर्द हमें भी होता है| ये खाली बर्तन इतना शोर क्यूँ करता है? हाथ से ज्यादातर खाली बर्तन ही गिरता है इसलिए कि हम उसे संभालने के लिए कोई अतिरिक्त प्रयत्न नहीं करते| हमारा यह अतिरिक्त आत्मविश्वास हमें धोखा दे जाता है| रिश्ते भी तभी टूटते हैं जब वह प्रेम या परवाह से खाली हो जाते हैं| कल किसी परिचित का रिश्ता टूटा| बात भी कभी-कभार ही होती थी उससे, फिर भी एक शोर अब तक मेरे अन्दर मचा हुआ है|

पास के कमरे में बेटी हाई वॉल्यूम पर "चीप थ्रिल्स" सुन रही है, साथ में गा रही है और शायद थिरक भी रही है| कायदे से तो मुझे अपने अन्दर मचे इस शोर से मुक्ति पाने के लिए उसके साथ शोर मचाते हुए थिरक लेना चाहिए, पर मेरे अन्दर मचा यह शोर ही मुझे रोक लेता है| संजीदगी और संवेदनशीलता बेहद बुरी शय है| हम नहीं कह पाते "भाड़ में जाए दुनिया, हम बजाए हरमुनिया" 

Thursday, February 9, 2017

दुनियादारी

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मैंने ऐसा तो नहीं कहा
कि लोग छोड़ दे समस्त दुनियादारी
कैसे कहूँ ऐसा !

बिखर रहा है धरती पर समाज उन दिनों से
जब सपने में भी नहीं सोचा था किसी वैज्ञानिक ने
जीवन के संभावना होने की मंगल ग्रह पर

अब जबकि हम पहुँच चुके हैं मंगल ग्रह पर सच में
और पाल रहे हैं उम्मीद जीवन का वहाँ
तो क्या यह नहीं है सामाजिक बिखराव के अगले स्तर की नींव ?

काँधों पर शव ढ़ोते लोग चल रहे हैं वृताकार इस तरह
जैसे कि वो कर रहे हों प्रदक्षिणा धरती की
श्मशान से लौटते यात्री भूल रहे हैं करना गंगास्नान 
और कर रहे हैं प्रस्थान मलय पर्वत की ओर
होकर चंदन की सुगंध से वशीभूत

तो यहाँ ले आयी है दुनियादारी हमें  !

जमीन को जमींदोज कर जमींदार
पका रहे हैं तंदूर पर बगेरी
प्रतिरोध अब एक वर्जित शब्द है
फिर कोई चीज है दुनियादारी!

Wednesday, February 8, 2017

शिल्प

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खड़ा रहता है पहाड़ सर उठाये 
कि धरती सह लेती है उसके हिस्से का दर्द 
उसे उठाये हुए निरंतर अपनी गोद में 

भय नहीं जानता पहाड़ 
कि भय स्वभाव है टूटने का 
टूटकर बिखर जाने का पत्थरों में 

पहाड़ अगर पहाड़ है
तो पत्थर से ही गढ़े जाते हैं शिल्प 
शिल्प अगर शिल्प  है 
तो सारा संसार है उसका ठिकाना 

तो प्रेम ?

पहले पहाड़ था प्रेम, 
फिर तो पत्थर भी नहीं रहा 
अब शिल्प बन बिकता है बाजार में !