Friday, October 6, 2017

काजल

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काजल 
है लक्ष्मण रेखा
सुख द्वारा खींची गई 
आँखों की देहरी पर 
आँसुओं के लिए 

दुःख का रावण 
आता रहता है 
वेश बदलकर 
बार-बार 

Monday, September 18, 2017

प्रेम

-------------------------------------------------------------------- यदि मुझे काजल लगाना पड़े तुम्हारे लिए, बालों और चेहरे पर लगाना पड़े रंग , तन पर छिड़कना पड़े सुगंध, सबसे सुन्दर साड़ी यदि पहनना पड़े, सिर्फ तुम देखोगे इसलिए माला चूड़ी पहनकर सजना पड़े, यदि पेट के निचले हिस्से के मेद, यदि गले या आँखों के किनारे की झुर्रियों को कायदे से छुपाना पड़े, तो तुम्हारे साथ है और कुछ, प्रेम नहीं है मेरा | प्रेम है अगर तो जो कुछ है बेतरतीब मेरा या कुछ कमी, या कुछ भूल ही, रहे असुन्दर, सामने खड़ी हो जाऊँगी, तुम प्यार करोगे | किसने कहा कि प्रेम खूब सहज है, चाहने मात्र से हो जाता है ! इतने जो पुरुष देखती हूँ चारों ओर, कहाँ, प्रेमी तो नहीं देख पाती !! ------------------------------------------- मूल कविता :- तसलीमा नसरीन बांग्ला से अनुवाद :- सुलोचना -------------------------------------------------------- প্রেম ---তসলিমা নাসরিন যদি আমাকে কাজল পড়তে হয় তোমার জন্য , চুলে মুখে রং মাখতে হয়, গায়ে সুগন্ধী ছিটোতে হয়, সবচেয়ে ভালো শাড়িটা যদি পড়তে হয়, শুধু তুমি দেখবে বলে মালাটা চুড়িটা পড়ে সাজতে হয়, যদি তলপেটের মেদ, যদি গলার বা চোখের কিনারের ভাঁজ কায়দা করে লুকোতে হয়, তবে তোমার সঙ্গে অন্য কিছু, প্রেম নয় আমার। প্রেম হলে আমার যা কিছু এলোমেলো, যা কিছু খুঁত,যা কিছুই ভুলভাল অসুন্দর থাক, সামনে দাঁড়াবো, তুমি ভালবাসবে। কে বলেছে প্রেম খুব সহজ, চাইলেই হয়! এত যে পুরুষ চারিদিকে, কই, প্রেমিক তো দেখি না!

Thursday, September 14, 2017

गुड़िया

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जन्मदिन के उपहार में तीन गुड़ियाँ मिलीं थी उसे 
जबकि दो पहले से ही रही उसके पास 
पाँच गुड़ियों का होना नहीं था कम किसी भी स्वप्न से 

पहली गुड़िया की बनाई ऊँची चोटी 
और  चूमते हुए उसे कहा "तुम मेरी छुटकी हो"
बार्बी नाम लेकर ही आई थी दूसरी 
जिसके सुंदर जूतों को निहारती थी देर तक 
तीसरी के पास गुलाबी फ्रॉक थी ठीक वैसी 
पहना था जैसा उसने अपने जन्मदिन पर और 
पूछकर माँ से रखा था उसका नाम "नयनतारा"
माँ उसे भी इसी नाम से बुलाती थी अक्सर 
नौ बरस की परी का रहा छोटा सा प्यारा संसार 

ठीक जब वह खेल रही थी अपने नए -पुराने गुड़ियों से 
और देख रही थी अगले जन्मदिन का प्यारा सपना 
घटित होती रही उसके जीवन में कुरूप एक घटना 
मामा कहती थी, मारा जिसने बचपन को किस्तों में 
नासमझ थी, फिर कौन करता है संदेह ऐसे रिश्तों में 
यह भी एक खेल है - बताता रहा उसे पूछे जाने पर 
और यह भी बताया कि गुड़िया वह थी इस खेल में 

जन्मदिन के उपहार में तीन गुड़ियाँ मिलीं थी उसे 
जबकि दो पहले से ही रही उसके पास 

अब वह कोई मामूली गुड़िया तो थी नहीं, हाड़-मांस की गुड़िया थी 
जब दिया जन्म उसने एक गुड़िया को, उसे नहीं पता था हुआ था जो 
रख दिल पर पत्थर कहा था माँ ने - पथरी थी, निकाल दिया डॉक्टर ने 
कह रहे थे लोग होकर हैरान हर तरफ - गुड़िया को गुड़िया हुई है  

जन्मदिन के उपहार में तीन गुड़ियाँ मिलीं थी उसे 
जबकि दो पहले से ही रही उसके पास 

बंद कर दी सभी गुड़ियाँ माँ ने अलमारी में एक रोज़ यह कहकर 
कि बंद हो जाना चाहिए अब गुड़ियों का खेल हमेशा के लिए 
कि दस बरस की लड़की बन चुकी थी खिलौना इस खेल आड़ की में 
सुबकती हुई लड़की कुछ भी नहीं समझ पायी 

जन्मदिन के उपहार में तीन गुड़ियाँ मिलीं थी उसे 
जबकि दो पहले से ही रही उसके पास ..........

Friday, September 1, 2017

कष्टार्तव

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जकड लेता है जन्म-विषाद अजगर की तरह 
मचाता है हाहाकार भीषण दर्द श्रोणि क्षेत्र में 
किंचित यहीं से शुरू होती है भग्नयात्रा स्त्रियों की 

जिह्वा से कंठ के मार्ग उतरता काढ़ा आर्द्रक का 
देता है आजन्म स्वाद बचे रहने का मृत्यु-उत्सव में 
मन करता है चित्कार - रक्त-स्तम्भक नागकेसर 

कहता है मस्तिष्क बचे रहने की तीव्र इच्छा पर धरकर हाथ 
करना पड़ता है खुद को ध्वंश कई-कई बार गढ़ने के लिए 
फिर क्षुद्र देह्कोष और जीवन के मूल में निहित है रक्तपात 

Saturday, August 19, 2017

कोलेस्ट्रॉल

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हमारे रक्त में है वह मौजूद बन कई जन्मों का पाप 
पाप, जो मिला हमें जन्म लेते ही विरासत में पूर्वजों से 
और बाद में हमारे अपने कर्मफल स्वरूप 
पाप, जो नहीं घुल पाया रक्त में सदियों बाद भी 
अन्य तमाम पापों की तरह 
पाप, जिसने हृदय की कुण्डली में लिखा सर्वनाश  
और कुण्डली मार बैठ गया नाग की तरह धमनियों में 

न चलो, तो भी दुखता रहता है पाँव, पुराने प्रेम की तरह 
जो पैदल चलो, तो फूलने लगती है साँस 
कितने सहस्र वर्ष चलने पर धुलेगा यह पाप ?
बह गए एक-एक कर हमारे तमाम पूर्वज गंगा में 
पर नहीं धुल सका, रहा यह ऐसा पाप  
तो संसार का सार यही हुआ न 
कि बह जाती हैं तमाम इच्छाएँ आशा के साथ 
कि बह जाते हैं प्राणी और रह जाता है पाप !!!

बढ़ता - घटता रहता है रक्तचाप कोसी के जलस्तर की तरह 
खून गाढ़ा होता रहता है, डॉक्टर हो जाते हैं लाचार सरकार की तरह 
तो मान लिया जाय कि ऐसे ही आती रहेगी मृत्यु की भीषण बाढ़ 
और हम पहुँच जाएँगे अपने अंतिम पते पर मिटटी में 
जब भी करना चाहा महसूस सीने में दफ्न साँसों को, पाया स्पर्श शून्य का  
इस स्थिर प्रगाढ़ शून्याकार निःशब्द घेरे में हो बंद जिंदगी है बीतनी 
रह-रहकर ले रहे हैं हम जो लम्बी साँस, उसकी लम्बाई है कितनी ?

जिंदगी निःशब्द शब्दबिंदुओं का अंतराल मात्र है !!!

Sunday, August 13, 2017

थायराइड

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घर के नमक में आयोडीन को आए हुए कोई तेईस साल 
और शरीर से उसकी मात्रा घटे ग्यारह साल हो गए 
फिर जाती रही जमींदारी अपनी ही देह की जमीन की 
कि मांसपेशियाँ छोड़कर चली गयीं अपना पुराना पता 
और लटकती रही साल्वाडोर डाली के तैलचित्र की तरह 
पर तैलचित्र की तरह उन्हें तन की दीवार पर बाँधे रखना हुआ मुश्किल 
कोई समझाए मांसपेशियों को कि इतनी आज़ादी ठीक नहीं 
तो विद्रोही स्वर में गाती हुई अकर्मण्यता कर देती है चढ़ाई आँखों पर 
पारित ही करना पड़ता है तब निंद्रा का शांति प्रस्ताव 
निंद्रा भंग होते ही पड़ती है नजर जब मेज के दर्पण पर 
करती है चित्कार आँखें, कहती हैं चिल्लाकर "अनैतिक है यह"
मन बनकर रह जाता है जैसे जलियांवाला बाग
कि तभी पड़ती है नजर बुद्ध की हँसती हुई प्रतिमा पर 
जिनके शरीर का साम्राज्य है विशाल, थायराइड के मरीज की तरह 
केश ठीक वैसे ही घुँघराले हैं जैसे हो जाते हैं इस व्याधि में 
आँखें तन्द्रामय हैं या ध्यान में लीन, लगती अपनी जैसी ही हैं 
तफात बस इतना है कि मुस्कुरा पा रहे हैं बुद्ध !!

खैरियत बस इतनी है कि स्नायुतंत्र के घर अब भी जलायमान है विद्युत् 
विवेक भटक रहा है मस्तिष्क के गलियारों में और मांसपेशियाँ मुक्तांचल में  !!!

Sunday, July 30, 2017

चरित्रहीन

(शरतचंद्र की किरणमयी के लिए)
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शरत बाबू ऐसे गए कि नहीं लौटे फिर कभी 
पर लेती रही जन्म तुम किरणमयी रक्तबीज सी 
दुनिया मनाती रही शरत जयंती बरस दर बरस 
नहीं बता गए शरत बाबू तुम्हारा जन्मदिन संसार को 
कि रहा आजन्म, जन्म लेना ही तुम्हारा सबसे बड़ा पाप 
और इस महापाप का ही तुम करती आ रही हो पश्चाताप 

अपने नयनों पर बनाकर पथरीला बाँध 
रोका तुमने अजश्र बूँदो का समुद्री तूफ़ान 
पास- परिवेश के पुरुषों का बन आसमान 
छुपाती रही अपनी समस्त असंतुष्टियों को 
स्निग्ध मुस्कान की तह में तुम घंटो चौबीस 
पढ़ाकर उन्हें अपने ही दुर्भाग्य का हदीस !!!

दिखता है तुम्हारे होठों पर मुस्कान का खिला हुआ ब्रह्मकमल 
जो बाँध लेता है अपनी माया से सबको, गहरे उतरने नहीं देता 
अदृश्य ही रह जाता है मन की सतह पर जमा कीचड़ लोगों से 
ठीक जैसा तुम चाहती हो अपनी लिखी कहानी की भूमिका में 
परिस्थितियों के बन्दीगृह का तुम अक्सर टटोलती हो साँकल 
गहन अन्धकार से नहा, पलकों पर लेती सजा, बिंदु -बिंदु जल 

निज को उजाड़ कर बसने देती हो पति का अहंकार घर 
रखती हो शुभचिंतकों को खुश अपनी अभिनय क्षमता से 
सजाती हो सामजिक आडम्बर से अपना प्रेमहीन संसार 
तुम्हारा असंदिग्ध भोलापन ही तो है सबसे बड़ी बीमारी 
कभी आईनाखाने जाकर देखो अपने होठों की उजासी 
हाँ, है तो फूलों सी ही बिलकुल, मगर वह फूल है बासी 

देखो उन मधुमक्खियों को, जो कर रही हैं चट 
छत्ते पर बैठ खुद अपना ही शहद संग्रह झटपट 
कि उन्हें पता है वो रहती हैं भालुओं के परिवेश में 
कब तक उड़ाती फिरोगी सपनों को सन्यासिनी के भेष में 
न करो फ़िक्र जमाने की, बाँध लो चाहनाओं को अपने केश में
क्या हुआ जो होना स्वतंत्र स्त्रियों का, है होना चरित्रहीन इस देश में 

अपने होठों पर फूलों की उजास नहीं, सूरज की किरण उगाओ  
सुनो समय की धुन लगाकर कान समयपुरुष के सीने से किरणमयी
बिखरो नहीं, गढ़ लो खुद को फिर एकबार अपने पसंद के तरीके से 
मत जिओ औरों की शर्त पर और, रखना सीख लो तुम शर्त अब अपने 
सुनती आई तो हो जमाने से जमाने की, सुनो अब केवल अपना ही कहना 
अपनी पुण्य आत्मा को कष्ट देने से तो है बेहतर तुम चरित्रहीन ही बनी रहना