Monday, February 12, 2018

सेल्फी

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मृणाल यूँ तो साधारण दिखने वाली छरहरे बदन की साँवली लड़की थी, पर उसकी एक जोड़ी आँखों में वो चमक थी कि जो भी उसे देखता रौशन हो जाता | वो अपनी हिरणी जैसी आँखों से जिसे देखती उसकी आँखों पर जमी काई हट जाती और उन आँखों में फिर मृणाल का ही सपना तैरता | उसे तरह -तरह से सेल्फी लेने का बेहद शौक था और उसने सेल्फी कला में महारत हासिल कर ली थी| अगरतला के एक होटल व्यवसायी ने एकबार अंतरजाल पर उसकी सेल्फी देख उसका पता लगाया और फिर उससे संपर्क साधा | फिर मिलने के बहाने तलाश किए जाने लगे | मिलने का मतलब होता था ढेर सारे उपहार और महंगे होटलों में खाना |  कुछ ही महीनों में मृणाल को विवाह का प्रस्ताव भी मिला | समाज के एक मध्यम वर्गीय परिवार में पली-बढ़ी लड़की के लिए यह किसी स्वप्न से कम न था | मृणाल ने अपने पिता को विवाह प्रस्ताव से अवगत करवाया | पहले तो यह सुनकर कि उनकी बेटी किसी से प्रेम करती है, वह अपना आपा खो बैठे | फिर जैसे ही उन्होंने लड़के का नाम सुना, तो पहचान गए | वह शहर का जाना - माना होटल व्यवसायी था | उनकी आँखें चमक उठीं | इतने बड़े घर में रिश्ते की बात तो वह सोच भी नहीं सकते थे | लड़के का ब्राह्मण न होना अब कोई बड़ी बात नहीं थी | वो झट से तैयार हो गए | एक महीने के अंदर शादी भी हो गयी | खूब धूमधाम से संपन्न हुई थी शादी | मृणाल के पिता इस शादी से बेहद संतुष्ट थे |

शादी के चौथे दिन देर रात कोई दरवाजा ज़ोर-ज़ोर से पीट रहा था | मृणाल के पिता सोने ही गए थे कि असमय दस्तक से चौंक दरवाजे तक गए | दरवाजा खोलने से पहले पूछा "कौन"

"मैं, मैं हूँ बाबा, जल्दी दरवाजा खोलिए" मृणाल ने रुंधे हुए गले से कहा |

हडबडाहट में दरवाजा खोला गया | मृणाल नाईट गाउन पहने नंगे पाँव ही चली आई थी | उसे देख घर के लोग हैरान थे | 

"अरे ! ऐसे कैसे चली आई हो? क्या हुआ ? सब ठीक तो है न" एक साथ कई आवाजें गूँजी |

"जल्दी दरवाजा बंद करो | कुछ भी ठीक नहीं | बाबा, आप मुझे कहीं छुपा दीजिए न" मृणाल बेतहाशा रो रही थी|

"पर हुआ क्या" मृणाल की माँ ने उसे एक ओर खींचते हुए पूछा |

"वो दूसरे कमरे में फोन पर था | मैंने उसकी सारी बातें सुन लीं | मैंने अपनी कानों से सुना कि कल वो हनीमून के बहाने मुझे दुबई ले जाएगा और वहाँ मुझे बेच देगा | कीमत भी तय हो चुकी है" मृणाल काँप रही थी |

मृणाल के पिता ने उसकी माँ से विमर्श किया और उसी रात मृणाल को लेकर वे दूर किसी गाँव में मृणाल की मौसी के पास चले गए | मृणाल का वहाँ रहना हर दृष्टि से सुरक्षित था | उस गाँव में बिजली न के बराबर रहती थी, यातायात के साधन भी सीमित थे और वह मौसी उसकी शादी में भी किसी कारण से नहीं आ पायी थीं, इसलिए उनसे वर पक्ष के किसी का कोई परिचय भी नहीं था | 

कई महीने गुजर गए| न तो मृणाल के ससुराल से कोई उसकी खबर लेने उसके मायके आया और मृणाल के घरवालों ने भी उनसे कभी संपर्क साधने की कोशिश नहीं की | मृणाल अपनी मौसी के यहाँ इस डर के साथ जी रही थी कि किसी रोज़ उसका पति उसे ढूँढता हुआ वहाँ न आ धमके | मृणाल के माता - पिता हर महीने एकबार  आकर उसे देख जाते और चिंतित होते | मृणाल अपने हृदय के व्याघात को वाणी भले ही न देती हो, पर माता-पिता उसके चेहरे से सब पढ़ लेते | 

एक साल बाद मृणाल के पिता को पता चला कि उस होटल व्यवसायी ने फिर से शादी की | एकबार उनके मन में आया कि पुलिस को इत्तिला कर सब बता देना चाहिए पर अगले ही पल उन्होंने विवेचना की कि उस होटल व्यवसायी के पास इतनी संपत्ति है कि वह लगभग सभी कुछ खरीद सकता है| वह एक और लड़की की जिंदगी खराब होने से बचाना तो चाहते थे, पर अपनी बेटी की कीमत पर नहीं | उन्होंने सोचा शायद इसी में मृणाल की मुक्ति निहित है और तय किया कि वह कुछ नहीं कहेंगे | इस घटना के सात महीने बाद उन्होंने दूर शहर के एक लड़के से मृणाल की शादी कर दी | शादी मृणाल की मौसी के घर से सम्पन्न हुआ | मृणाल के नए ससुराल वालों को उसका नाम मेघबालिका बताया गया | 

मृणाल अपनी मौसी के घर रहते हुए घर के कामों में दक्ष हो गयी थी| फिर चुपचाप रहते हुए कब मौन रहना उसकी आदत में शुमार हो गया, उसे भी पता न चला | चुप रहकर घर का सारा काम करने वाली स्त्री किसे अच्छी नहीं लगेगी ! बहुत कम समय में उसने अपने नए ससुराल में सभी लोगों का मन मोह लिया | साल भर बाद जब उसने एक बेटे को जन्म दिया, तो दोनों परिवारों में उत्सव सा माहौल था | लगभग दो सालों के बाद मृणाल के चेहरे पर मुस्कान देख उसके माता-पिता संतुष्ट और खुश थे |

बेटा रोज़ थोड़ा-थोड़ा बड़ा हो रहा था और मेघबालिका रोज़ थोड़ा-थोड़ा मृणाल हुई जाती थी | कभी फोन से बेटे की तस्वीरें लेती तो कभी खुद की उसके साथ सेल्फी |  सुंदर -सुंदर सुखद तस्वीरों से भरा साल बीत गया और बेटा एक साल का हो गया | मृणाल ने अपने नए जीवन साथी को कभी बताया था कि जब कंचनजंघा पर भोर का सूरज अपनी लालिमा बिखेरता है, तो उस दृश्य को देखने वाला इंसान सभी कुछ भूल जाता है| बेटे के जन्मदिन पर तय हुआ कि तीनों प्राणी दार्जिलिंग घूमने जाएँगे और उस दृश्य का साथ आनन्द उठाएँगे | पाँच घंटे के सफर के बाद मृणाल बेटे और पति, राजीव के साथ दार्जिलिंग में थी | वह अतीत की यादों में देर तलक डूबी रही | शाम के चार बजे घूमते हुए वे एक बेकरी तक गए | अंदर जाकर देखा बेकरी बस नाम में ही था, वह दरअसल एक छोटा सा रेस्तरां था | बेटे के जन्मदिन का केक काटा गया और रेस्तरां में मौजूद लोगों में बाँटा गया | ढ़ेरों तस्वीरें ली गईं | रात का खाना खाकर जल्द ही होटल आने का कार्यक्रम था | सुबह कंचनजंघा पर सूरज का जादू देखना था | 

कार्यक्रम के मुताबिक वे अलसुबह होटल से निकले | रास्ते में जगह-जगह रुककर सेल्फी ली गयी | अंततः वे उस जगह पर पहुँच ही गए जहाँ उनके साथ अन्य सैलानी भी टाइगर हिल पर उगते हुए सूरज का इन्तजार कर रहे थे | लगभग आधे घंटे बाद सूर्योदय हुआ और कुछ देर के लिए वहाँ खड़े सभी लोगों की साँसे रुक गयीं | नजारा था ही ऐसा अलौकिक | मृणाल ने पहले टाइगर हिल पर सूरज की स्वर्णिम किरणों के बिखरते जादू को फोन के कैमरे में क़ैद किया और फिर उसने टाइगर हिल के उस मनोरम दृश्य के साथ पति और बेटे की तस्वीर ली | पास से तीनों का टाइगर हिल के साथ वाली सेल्फी में उनका चेहरा ही दिख रहा था, टाइगर हिल नहीं दिख रहा था | मृणाल ने राजीव से कहा भी कि वह किसी दूसरे सैलानी से आग्रह करे कि वह इन लोगों की तस्वीर खींच दे पर राजीव को किसी अजनबी के हाथों में फोन देना सुरक्षित न लगा और उसने कहा कि वह खुद ही थोड़ी दूरी पर आगे जाकर सेल्फी ले लेगा | वह फोन को सेल्फी मोड में रखकर फोन में देखता हुआ आगे बढ़ने लगा | फोन में उसकी नजरें कंचनजंघा पर टिकी थीं और उसका पीठ मृणाल की ओर थी | मृणाल ने अचानक गौर किया कि वह आगे बढ़ता ही जा रहा है और उसके चार कदम आगे गहरी खाई है| 

"ठहरो" वह चिल्लाई | पर वह उस मनोरम दृश्य में इस कदर खो चुका था कि जब तक वह समझ पाता कि यह उसकी मेघबालिका की आवाज है, उसके पाँव के नीचे से जमीन जा चुकी थी और वह हवा में तैरता हुआ खाई में गिर रहा था | सैलानी, जो अभी तक कंचनजंघा देखने में व्यस्त थे. उस ओर दौड़ पड़े और फोटो लेने लगे | मृणाल उन तस्वीरों में कहीं नहीं थी |

Sunday, February 4, 2018

पुरुषोत्तम

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दशरथ चौधरी की तीन संतानों में सबसे बड़ा था पुरुषोत्तम | दशरथ चौधरी जब खाड़ी देश से खूब सारा धन कमाकर लौटे, तो सबसे पहले इंटरमीडिएट में पढ़ रही बेटी का ब्याह कर दिया जबकि वह आगे पढ़ना चाहती थी | दोनों लड़कों को किसी तरह ग्रेजुएट होने तक फॉर्म भरने के रूपये दिए |  जब पुरुषोत्तम ग्रेजुएट हो गया , उसके पिता ने कहा "अब हम तुम्हारी जिम्मेदारी से मुक्त हुए | अब तुम्हारे जीवन की बागडोर तुम्हारे हाथों में है| अपने लिए कोई नौकरी देख लो | अब मैं तुम्हारा खर्चा नहीं चला सकता "

पुरुषोत्तम नौकरी ढूँढने दिल्ली चला आया | नौकरी ढूँढते हुए दो जोड़ी चप्पलों के घिस जाने के बाद उसे एक इंटेरनेट कैफे में नौकरी मिली | कॉलेज के दिनों से ही पुरुषोत्तम कंप्यूटर की मरम्मत करने लगा था | वही काम आया | एक दिन वहाँ उसने मैथिली को देखा | मैथिली सुन्दरता की प्रतिमा थी | पुरुषोत्तम कॉलेज के दिनों से ही उसे चाहता था, पर कभी इज़हार करने लायक साहस न जुटा पाया |

"अरे ! तुम यहाँ क्या कर रही हो" खुशी मिश्रित आश्चर्य से पुरुषोत्तम ने पूछा |

"यही सवाल मेरा भी है| तुम यहाँ क्या कर रहे हो"मैथिली ने खुशी जाहिर करते हुए कहा |

"मैं यहीं काम करता हूँ और पास ही रहता हूँ" कहते हुए पुरुषोत्तम कुछ उदास हो गया |

"अरे वाह ! बहुत बढ़िया | मैं यहाँ मेल चेक करने आई हूँ|" कहते हुए मैथिली एक कंप्यूटर की ओर बढ़ गयी |

जाने से पहले मैथिली ने अपना फोन नम्बर पुरुषोत्तम को देते हुए कहा "मैं दिल्ली विश्वविद्यालय के पास रहती हूँ जबकि मेरा दफ्तर दक्षिणी दिल्ली में है| तुम अपने कमरे के आसपास ही मेरे लिए भी कोई कमरा दूंढ़ दो"

"जरूर | समझो हो गया" पुरुषोत्तम ने आश्वस्त करते हुए कहा |

एक महीने बाद मैथिली पुरुषोत्तम की पड़ोसन बन चुकी थी | आसपास रहने के कारण अक्सर दोनों एक-दुसरे से टकरा जाते, कभी बस स्टॉप पर तो कभी सब्जी मंडी में और फिर कभी एक-दुसरे के घर चाय या खाने के बहाने अनायास ही हो आते |  एक रविवार पुरुषोत्तम ने मैथिली को बताया कि उसके बुआ के लडके की सगाई है और वह उसे अपने साथ ले जाना चाहता है| छुट्टी का दिन होने के नाते मैथिली बिना किसी संकोच के उसके साथ चल पड़ी |

चार मंजिला ईमारत की छत पर खूब भीड़ थी | मैथिली एक कोने में जा खड़ी हुई | पुरुषोत्तम भी उसके साथ ही खड़ा रहा और सभी से उसका परिचय कराता रहा | कुछ समय बाद उसके जीजा जी आए और कहा " आप दोनों को भी अब शादी के विषय में विचार करना चाहिए |"

मैथिली अवाक् होकर पुरुषोत्तम की ओर देखने लगी जबकि पुरुषोत्तम मुस्कुराकर रह गया | मैथिली को अजीब सी बैचेनी होने लगी और उसने पुरुषोत्तम से लौटने का आग्रह किया |  पुरुषोत्तम मैथिली को छोड़ने उसके कमरे तक गया | कमरे पर पहुँचते ही मैथिली ने पुरुषोत्तम से पूछा "तुम्हारे जीजा जी क्या कह रहे थे?"

"अरे छोड़ो | मैंने उनसे कुछ भी नहीं कहा | तुम्हें साथ देखा तो उन्हें लगा, शायद हम..."कहते हुए पुरुषोत्तम रुक गया |

"मैं तुम्हें कुछ बताना चाह रही थी| तुम अभिराम से तो मिल ही चुके हो पिछले इतवार" कहते हुए मैथिली संकोच कर रही थी |

"कौन, वो नीली आँखों वाला लड़का?" पुरुषोत्तम ने उत्सुक होकर पूछा |

"हाँ, वही | हम दोनों एक-दुसरे को चाहते हैं और शादी करना चाहते हैं" मैथिली को यह बताना बेहद जरूरी लगा |

"ओ..."कहकर उदासी छुपाता पुरुषोत्तम झूठी मुस्कान बिखेरता हुआ "गुड नाईट" कहकर चला गया | मैथिली अब थोड़ा हल्का महसूस कर रही थी |

पुरुषोत्तम सहज और सुलझे हुए व्यक्तित्व वाला इंसान था |  मैथिली का सच जानने के बाद वह भले ही संयमित हो गया था, पर दोस्ती निभाने में उसने कोई कसर नहीं छोड़ी |

उधर सगाई की शाम मैथिली को पुरुषोत्तम के साथ देखकर ही पुरुषोत्तम के घर में उसकी शादी को लेकर बातचीत शुरू हो चुकी थी, इधर मैथिली का पंजाब की एक बड़ी कम्पनी से नौकरी का बुलावा आ गया था | दस दिनों के बाद मैथिली पंजाब चली गयी |

एकदिन पुरुषोत्तम के पिता ने उसे बताया कि उन्होंने उसकी शादी के लिए लड़की पसंद कर ली है और कुरियर से लड़की की तस्वीरें भी भेज दी है| न पुरुषोत्तम से कुछ पूछा गया , न ही पुरुषोत्तम ने कुछ पूछा | कुछ दिनों बाद पुरुषोत्तम के हाथों में वह लिफ़ाफ़ा था जिसमे तस्वीरों के साथ थी उसके पिता की चिठ्ठी  |

"प्रिय पुरुषोत्तम,

उम्मीद है सब बढ़िया है| तुम्हारे लिए हमने एक लड़की पसंद की है| पसंद क्या, मैं तो उसके पिता को जुबान दे चूका हूँ| एकबार तुम भी वैदेही की तस्वीर देख लो, बाद में न कहना कि बिना लड़की देखे शादी करवा दी गयी | चाहो तो तस्वीर के पीछे लिखे मोबाइल नंबर पर बात भी कर लो | मुझे तो बड़ी सुशील लड़की लगी | दहेज भी मुँहमांगा दे रहे हैं| शादी के लिए अभी छुट्टियों की अर्जी दे दो, तीन महीने ही रह गए हैं|

और सुनो, शादी के लिए खरीदारी पर फिजूल खर्च करने की कोई जरुरत नहीं| सब मैं देख लूँगा |

हो सके तो शादी से दस दिन पहले आ जाना |

तुम्हारा पिता
दशरथ "

पुरुषोत्तम कुछ देर सोचता रहा और फिर तस्वीरों में खो गया | वैदेही एक साधारण सी दिखने वाली प्यारी लड़की लगी | उसने उसी रात वैदेही को फोन लगाया और बात की | बातों से वह बेहद प्यारी लगी और पुरुषोत्तम ने अपने घर में बता दिया कि उसे इस शादी से कोई आपत्ति नहीं | उसने मैथिली को भी फोन पर अपनी शादी कि सूचना दी |

घर में शादी की तैयारियाँ पूरी हुई और तीन महीने बाद पुरुषोत्तम और वैदेही की शादी हो गयी | पुरुषोत्तम वैदेही को लेकर वापस दिल्ली आ गया | खूब जमने लगी दोनों की आपस में और वैदेही ने हर प्रकार से पुरुषोत्तम का साथ दिया | वैदेही को पुरुषोत्तम के एक कमरे में रहना अच्छा नहीं लगता था, पर वह जानती थी कि पुरुषोत्तम की आय में उससे बेहतर कुछ नहीं मिल पाता | उसने पहले एक ब्यूटी पार्लर में प्रशिक्षण लिया और फिर वहीं काम करने लगी| कुछ समय बाद दोनों दो कमरों के घर में किराए पर रहने लगे | वैदेही ने अपना ब्यूटी पार्लर खोल लिया | इसी बीच पुरुषोत्तम को भी मनचाही तनख्वाह वाली नौकरी मिली | चार साल बाद उनके घर एक लड़की का जन्म हुआ जिसका नाम उन्होंने राज नंदिनी रखा | बच्ची के आने से वैदेही का काफी समय बच्ची की देखरेख में चला जाता जिससे ब्यूटी पार्लर खोलने में देर होती | ब्यूटी पार्लर से घर तीन किलोमीटर की दूरी पर था | पुरुषोत्तम ने इसका भी हल ढूँढ निकाला | उसने ब्यूटी पार्लर के ठीक सामने वाली गली में दो कमरे का घर किराए पर ले लिया | गली से निकलते ही बायीं ओर था प्रकाश ड्राईक्लिनर्स जिसके ठीक सामने था वैदेही ब्यूटी पार्लर | प्रकाश ड्राईक्लिनर्स को लगभग पुरुषोत्तम के ही उम्र का प्रकाश चलाता था| पिछले कुछ महीनों में पुरुषोत्तम और प्रकाश की अच्छी दोस्ती हो गयी थी | फिर पुरुषोत्तम था भी बड़ा मिलनसार | नए घर से पुरुषोत्तम का दफ्तर काफी दूर हो गया था, जिसकी वज़ह से उसे घर लौटने में अक्सर ही देर हो जाती थी |

अभी नए घर में आए बमुश्किल सात महीने ही गुजरे थे कि एक रविवार सब्जी खरीदते हुए  प्रकाश का सामना पुरुषोत्तम से हुआ |

"और भाई, तुम तो ईद का चाँद हो गए | कब जाते हो, कब आते हो, तुम्हारे तो दर्शन दुर्लभ हो गए" प्रकाश ने सब्जी वाले से टमाटर का थैला लेते हुए कहा |

"हाँ यार, क्या करूँ| रहता यहाँ हूँ और तुम तो जानते ही हो मेरा दफ्तर..."अभी पुरुषोत्तम बात पूरी भी नहीं कर पाया था|

"वो सब तो ठीक है, पर घर की भी कुछ खबर रखते हो या मुहल्लेवालों के भरोसे रख छोड़ा है अपना परिवार" प्रकाश ने पुरुषोत्तम के काँधे पर हाथ रखते हुए कहा |

"कहना क्या चाहते हो? मैं कुछ समझा नहीं" पुरुषोत्तम परेशान था |

"कुछ ख़ास नहीं | पिछले बीस - पच्चीस दिनों से एक गजब का संयोग दिखा | हर रोज़ दोपहर तीन बजे वैदेही भाभी राज नंदिनी को हेयर ड्रेसर के पास रखकर घर जाती हैं और उसके ठीक कुछ देर बाद अपने एम पी साहब, शुक्ला जी का बड़ा बेटा दशकंध आपके घर जाता है| हो सकता है आपको पता हो, पर मुझे लगा आपको बता देना ठीक रहेगा" कहते हुए प्रकाश प्रश्न भरी नजरों से पुरुषोत्तम की ओर देखने लगा |

पुरुषोत्तम को ठोकर तो जोर की लगी थी, पर उसने खुद को सहज दिखाते हुए कहा "ऐसा हो सकता है कि घर में कोई आए और मुझे पता न हो ! दशकंध वैदेही से भूगोल पढ़ने आता है| एमपी का बेटा है, मना करते नहीं बना | शाम में समय नहीं दे सकती न, इसलिए दिन में एक घंटे पढ़ाती है| तुम्हें शायद नहीं पता वैदेही ने भूगोल से स्नातक किया है|"

"ओह ! अच्छा " प्रकाश के लहजे में व्यंग था |

पुरुषोत्तम सब्जी की थैली उठाकर घर की ओर चल पड़ा | उसका मन बड़ा बेचैन था | वह पूरी रात परेशान रहा | उस रात उसने वैदेही से कई बार पूछा "वेद, क्या तुम मुझसे अब भी प्यार करती हो?"

"आज अचानक ऐसा क्यूँ पूछ रहे हो" वैदेही ने हाँ या ना के असमंजस को टालते हुए कहा | फिर जिस इंसान से ब्याह किया और जिसके बच्चे की माँ बनी, उससे यह कहना कि प्रेम खत्म हो गया, आसान भी तो नहीं होता |

अगले दिन पुरुषोत्तम बड़े अनमने तरीके से दफ्तर गया | उसका किसी काम में मन नहीं लग रहा था | उसने सर दर्द का बहाना बनाया और डेढ़ बजे दफ्तर से निकल पड़ा | उसे घर पहुँचने में अमूमन दो घंटे लगते, पर दिन में सडकें खाली थीं, सो डेढ़ घंटे में ही पहुँच गया | उसने कॉलिंग बेल बजाने के लिए हाथ उठाया, पर कुछ सोचकर रूक गया | वह पड़ोसी के घर गया और उनसे कहा कि उनकी छत पर उसके कपड़े उड़कर गिर गए और वह उन्हें उठाने आया है| वह छत पर गया और उस छत से सटे अपने घर की छत पर कूद गया | छत की सीढ़ियों से उतरता हुआ वह घर के अंदर दबे पाँव दाखिल हुआ | उसकी कानों तक जो आवाजें आ रहीं थीं, वह उनका पीछा करते हुए बैठक तक गया | दरवाजा बंद नहीं था, पर पूरी तरह खुला हुआ भी नहीं था | उसने बाहर से झाँककर वो मंजर देखा कि जड़ हो गया | सोफे पर वैदेही और दशकंध एक-दूसरे से गुथे हुए थे| कुछ देर रुककर वह खुद को संभालता हुआ वहीं कमरे के बाहर दीवार पर पीठ टेक कर आँखें मूँद बैठ गया |

थोड़ी देर बाद वैदेही ने जैसे ही दरवाजा खोला, उसकी आँखें फटी रह गयीं और दोनों हाथ जुबान पर | दशकंध तूफ़ान की तरह भाग गया |

पुरुषोत्तम भले ही चुप था, पर उसकी नजर वैदेही से न जाने कितने सवाल कर रही थी |

"मुझे माफ़ कर दो | मैं बेहद अकेली हो गयी थी | मुझे प्यार चाहिए था और तुम्हारे पास मेरे लिए वक़्त ही नहीं था | दशकंध ऐसे समय में मेरे जीवन में आया, जब मैं अकेलेपन और अवसाद की खाई में गिरती चली जा रही थी | अब जो चाहो मुझे सजा दो" कहती हुई वैदेही रोने लगी |

पुरुषोत्तम उठा और सीधे पार्लर गया | वहाँ उसने राज नंदिनी को उठाया और घर की ओर आने लगा | प्रकाश ने थोड़ी देर पहले दशकंध को उस गली से तूफ़ान की तरह गुजरते देखा था | फिर शाम के साढ़े चार बजे पुरुषोत्तम का पार्लर आकर राज नंदिनी को लेना... प्रकाश घटना का अंदाजा लगा चूका था | उसने पुरुषोत्तम को टोकते हुए कहा "सच्चे मित्र हैं हम तुम्हारे | कल तुमने भले ही हमारे सामने नाटक कर लिया, पर इस गली में जो नाटक होता है न, उसे न जाने कितने लोगों ने देखा है| अब तुम्हारी इज्जत इसी में है कि भगवान राम की तरह तुम भी वैदेही भाभी को छोड़ दो | (राज नंदिनी की ओर दिखाकर) इसे भी उनके साथ ही दे देना | न जाने कहाँ से आई है"

पुरुषोत्तम में आगे एक भी शब्द सुनने का धैर्य न बचा था | वह घर की ओर बढ़ गया |

घर आकर उसने राज नंदिनी को वैदेही के सुपुर्द करते हुए उसे खाना खिलाकर सुला देने को कहा | शाम के लगभग साढ़े सात बजे जब राज नंदिनी सो चुकी थी, पुरुषोत्तम ने वैदेही से कहा "तुम चाहो तो दशकंध शुक्ला के साथ जा सकती हो| राज नंदिनी मेरे पास रहेगी |"

"नहीं, मैं राज नंदिनी के बिना नहीं रह सकती" कहते हुए वैदेही फिर रोने लगी |

"मेरे बिना तो रह ही लोगी | अब तो आत्मनिर्भर भी हो" पुरुषोत्तम ने लगभग पूछने के अंदाज में कहा |

"मैं आज जो भी हूँ, सिर्फ तुम्हारी वज़ह से हूँ| तुमने अपने पिता की मर्जी के खिलाफ़ मुझे पार्लर जाकर काम सीखने का मौका दिया | तुमने मेरी सुविधा का ख्याल रखते हुए अपने दफ्तर से और भी दूर घर लिया | पर तुम घर देर से आने लगे | अक्सर मेरे सो जाने के बाद आते और अलसुबह उठकर चले जाते | तुम्हारी शक्ल तक ठीक से देखने के लिए मुझे रविवार का इन्तजार करना पड़ता | मुझे पार्लर से फुर्सत मिलती, तो आराम की जगह घर के काम और राज नंदिनी की देखभाल |प्यार के लिए तरस गयी थी | अकेलेपन और अवसाद के दलदल में मैं बेतरह धँस चुकी थी कि दशकंध एक दोस्त बनकर आया | उसने मुझे अपना वक़्त दिया और मुझे सुना | फिर हमलोग कब इतने करीब आ गए, पता ही नहीं चला| चलो, हम तुम्हारे दफ्तर के पास कोई घर ले लेते हैं| मैं पार्लर बंद कर दूँगी, पर इस परिवार को बिखरने न दूँगी| हम फिर से पहले की तरह रहेंगे एक कमरे में" वैदेही पुरुषोत्तम से लिपटकर रो-रो कर कह रही थी |

पुरुषोत्तम उस रात सो नहीं पाया | वह सोचता रहा कैसे वह एक कमरे के मकान में रहता था और वैदेही ने अपनी सूझबूझ और मेहनत से कम समय में ही घर की आर्थिक स्थिति दुरुस्त कर दिया था | वैदेही ने उससे कभी कोई शिकायत नहीं की बल्कि हमेशा उसकी मददगार बनी रही | आखिर उसने ऐसा क्यूँ किया ? थोड़े से प्रेम के लिए ? क्या प्रेम गैर जरूरी था जीवन में ? अगर हाँ, तो उसे आज वैदेही पर गुस्सा क्यूँ आया ? अगर नहीं, तो वैदेही ने क्या गलत किया अपने लिए थोड़ा सा प्रेम चुनकर ?  इसी तरह के कई प्रश्न जेहन में उभरते रहे जिनके जवाब भी वो खुद ही थे |

अगली सुबह वह दुसरे दिनों कि अपेक्षा जल्दी उठा और वैदेही से भी उठने को कहा | वैदेही असमंजस में कुछ समझ नहीं पा रही थी कि पुरुषोत्तम क्या चाह रहा था |

"क्या बात है" वैदेही ने डरते हुए पूछा |

"चलो, पार्क हो आते हैं| याद है तुम्हें हम शादी के बाद जब पहली बार दिल्ली आए थे, तुम मुझे जबरन उठाकर पार्क ले जाती थी| मुझे लग रहा है कि हमें फिर से हर सुबह पार्क जाना चाहिए" पुरुषोत्तम ने शांत आवाज में कहा |

वैदेही कुछ देर तक अपलक पुरुषोत्तम को देखती रही और फिर उससे लिपटकर रोने लगी |

थोड़ी देर बाद राज नंदिनी को लेकर दोनों पास के पार्क गए | राज नंदिनी पार्क में चिड़िया और मोर देखकर बेहद खुश थी | वैदेही और पुरुषोत्तम जैसे अतीत के दिनों में खो गए थे |

सुबह की सैर से लौटते हुए उन दोनों ने तय किया कि रात का खाना वह बाहर खाएँगे | फिर पुरुषोत्तम अपने दफ्तर चला गया और वैदेही घर का काम निपटाकर अपने पार्लर|

शाम में पुरुषोत्तम जल्दी आ गया था | जब रात का खाना खाकर वे लौट रहे थे,  प्रकाश ड्राईक्लीनर्स बंद कर रहा था |

"ओह ! मुझे तो लगा था रामचंद्र जी सीता जी को जंगल तक छोड़ने गए हैं| पर देखकर लग रहा है अग्नि परीक्षा देकर स्वयं आए हैं "प्रकाश ने पुरुषोत्तम के करीब आकर कहा |

"मैं एक औसत इंसान हूँ, कोई भगवान नहीं | गलती इंसानों से ही होती है| औसत इंसानों से तो कई बार | मैंने भी कई दूसरी तरह की गलतियाँ की हैं जिंदगी में | जब मैं साधारण सा मनुष्य हूँ, तो जीवन संगिनी के रूप में देवी या सती कि अपेक्षा भी नहीं रखता| अगर वैदेही से गलती हुई, तो कहीं न कहीं मुझसे भी लापरवाही हुई तो है| फिर सजा उस अकेली को क्यूँ?" पुरुषोत्तम कि आवाज में आत्मविश्वास था |

"भगवान हो कि नहीं हो, नहीं पता | पर एक बात तो माननी ही पड़ेगी कि पुरुषों में उत्तम पुरुष हो | साधारण या औसत तो बिलकुल भी नहीं| आज से और भी सम्मान बढ़ गया तुम्हारे लिए" कहते हुए प्रकाश ने पुरुषोत्तम को गले लगाया और आगे बढ़ गया |

राज नंदिनी ऊँगली से घर की ओर इंगित कर रही थी, वे एक-दूसरे का हाथ थामे घर की ओर चल पड़े | पूर्णिमा का चाँद अपनी शीतल छाया उन पर बनाता हुआ उनके साथ चलने लगा |

Monday, January 22, 2018

कहानी का अंत

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ऐसा पहली बार था कि सुष्मिता किसी के जीवन पर आधारित कहानी लिख रही थी| अनमोल ने खुद ही एकदिन सुष्मिता को अपनी आपबीती सुनाते हुए कहा था "तुम तो लेखिका हो, मेरे जीवन पर एक उपन्यास लिख डालो"

"उपन्यास लिखने के लिए तो न जाने कितना इन्तजार करना पड़ेगा और कौन जाने आने वाले सालों में आपके जीवन में कौन सा मोड़ आ जाए | हाँ, बहरहाल एक कहानी जरूर लिखने की कोशिश रहेगी" सुष्मिता ने अनमने तरीके से कहा था |

डेढ़ बरस बाद एकदिन सुष्मिता को यह वाकया याद आया और उसने अनमोल की कहानी को जस का तस पन्ने पर उकेरना शुरू कर दिया | पिछली कई मुलाकातों  से जो कुछ भी जान पायी थी, कहानी में वो सब कुछ शामिल किया | कई पन्ने लिख लेने के बाद सुष्मिता को लगा कि कहानी के साथ न्याय करने के लिए उसे अनमोल के जीवन की घटनाओं को करीब से जानना होगा| 

अनमोल सुष्मिता को शादी का प्रस्ताव दे चूका था और सुष्मिता के उत्तर की प्रतीक्षा कर रहा था | जब भी सुष्मिता उससे कहती कि उसे कहानी पूरा करने के लिए उससे कई बातें पूछनी हैं तो अनमोल एक ही जवाब देता "जब तक तुम मेरे प्रस्ताव का जवाब नहीं दोगी, कहानी कैसी पूरी होगी| तुम्हारा जवाब ही कहानी को पूरा करेगा"

एक शाम सुष्मिता जब अस्पताल में डॉक्टर दिखाने के क्रम में अपनी बारी का इंतजार कर रही थी, अनमोल उसके ठीक बगल में बैठा था | वह सुष्मिता का साथ देने  के लिए ही वहाँ गया था | सुष्मिता को लगा कि वक़्त का सही उपयोग अनमोल से उन तमाम सवालों के जवाब पा लेने में है, जिन्हें जाने बिना कहानी को दिशा दे पाना मुश्किल था| उसने अनमोल से पहला ही सवाल किया था कि अनमोल के चेहरे के भाव बदल गए और वह कह उठा "रहने दो न | क्या वो घटनाएँ इतनी अच्छी थीं जिनका बारम्बार ज़िक्र करने का मन हो | कई लोगों ने मुझे भला-बुरा सुनाया था और मैं चुप रह गया था| अब मन नहीं करता उन घटनाओं को याद करने का"

सुष्मिता ने आगे कुछ पूछना मुनासिब नहीं समझा | वह खुद जीवन के झंझावातों से होकर गुजर चुकी थी और समझ सकती थी कि आपबीती सुनाने का मतलब हर बार उन पलों  से होकर गुजरना होता है जिन्हें अमूमन कोई याद नहीं करना चाहता | सुष्मिता ने उसी पल अनमोल से कहा "ठीक है| मैं फिर अपनी कल्पना से कहानी को कोई नाटकीय मोड दूँगी और जब आप कहानी पढ़ेंगे तो एकबार आपको भी पता न चलेगा कि कहानी आपके जीवन पर आधारित है|"

अनमोल ने सहमति में सर हिलाया था | इस घटना के कई दिनों बाद सुष्मिता ने कहानी को नाटकीय रूप देते हुए कई काल्पनिक घटनाओं को कहानी में जोड़ा और कहानी समाप्त की | कहानी का अंत लिखते हुए उसने अनमोल की बजाय अपने पाठकों का ख्याल रखा | कहानी समाप्त होते ही उसने सबसे पहले अनमोल को यह जानकारी दी और साथ ही यह भी बताया कि घटनाओं की पूरी जानकारी के अभाव में उसने कहानी का फ़िल्मी अंत दिया है | अनमोल कहानी का कुछ अंश पहले पढ़ चूका था और अब पूरी कहानी पढ़ने के लिए उत्सुक था | अगली सुबह उसने कहानी पढ़ते ही सुष्मिता से पूछा "कहानी का जो अंत तुमने लिखा है, क्या वह सच है?"

"अरे नहीं ! मैंने तो पहले ही कहा था कि फ़िल्मी अंत है| कल्पनाओं की स्याही ने जो उकेरा, लिख डाला" कहते हुए सुष्मिता समझ गयी कि अनमोल को कहानी का अंत पसंद नहीं आया | कहानी के अंत में सुष्मिता ने अपने किरदार को किसी और के साथ दिखाया था |  सुष्मिता ने फोन किया तो अनमोल ने काट दिया |

सुष्मिता कुछ समय से अनमोल के प्रस्ताव पर सकारात्मक प्रतिक्रिया देने का विचार कर रही थी पर कहानी पढ़कर अनमोल ने जैसी प्रतिक्रिया दी, सुष्मिता ने मन ही मन सोचा कि काश ! उसने कहानी को अधूरा ही छोड़ दिया होता | यह भी सोचा कि जो इन्सान एक काल्पनिक कहानी पर ऐसी प्रतिक्रिया दे सकता है, वह जब उसके जीवन की सच्चाईयों से रु-ब-रु होगा, तब कैसी प्रतिक्रिया देगा| 

अनमोल की प्रतिक्रिया सोचते हुए सुष्मिता सुबह से शाम तक परेशान रही | रात के लगभग दस बज रहे थे| एक अप्रत्याशित प्रश्न ने उसे धक्के देकर कई अन्य अनुत्तरित प्रश्नों के पते पर पहुँचा दिया और फिर उसके मन के पेड़ पर उदासियों के पंछी घर बनाने लगे | इस स्थिति से उबरने के लिए वह बाहर पार्क में गयी| उसने सुना था कि चलते-चलते कहीं पहुँच ही जाते हैं, कुछ ऐसा ही सोचकर पार्क के जॉगिंग ट्रेक पर चली जा रही थी| तभी उसके बेटे ने कहा कि उसे झूला झूलना है| फिर क्या था, माँ-बेटा दोनों झूला झूले| झूला झूलते हुए भी न जाने सुष्मिता क्या सोच रही थी कि तभी उसके बेटे ने ध्यान दिलाया कि झूले में पीछे जाते हुए पाँव भी पीछे की ओर मोड़ना होता है| सच! वह तो भूल ही गई थी!! उसे बचपन के दिन याद आ रहे थे और वह आँखें मूँदकर झूल रही थी| अचानक आँखें खुली तो देखा ऊपर आसमान तारों से भरा था| उसे लगा कभी - कभी सर उठाकर आसमान की ओर भी देख लेना चाहिए| उसने अपने जेहन पर जोर डाला कि उसने आखिरी बार कब फुर्सत से आसमान में तारों को निहारा होगा| बहुत सोचने पर याद आया पाँच बरस पहले रात के समय जिम कॉर्बेट पहुँचने पर सबसे पहले ध्यान तारों पर ही गया था| अभी वह प्राकृतिक नजारों में खोई ही थी कि उसका ध्यान सप्तर्षि मंडल पर गया, जो उसे आसमान पर टंका प्रश्न लगा| झटके में प्रकृति का सारा सौन्दर्य बोध ख़त्म हो गया| वापस सवाल उसका पीछा करने लगे और वह उनसे भागती हुई घर आ गयी| बहुत देर तक सोचने के बाद वह इस नतीजे पर पहुँची कि दरअसल सवाल ही जवाब था और कुछ कहानियाँ अधूरी ही अच्छी लगती हैं, उसकी अपनी कहानी की तरह |

उस रोज उसकी लिखी कहानी के साथ ही उस कहानी का भी अंत हो गया जो वह अपनी जिंदगी के पन्ने पर लिखने चली थी |

Saturday, January 20, 2018

अद्वैत

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अलमारी से लगभग सभी चीजें निकाली जा चुकी थी| अलमारी के ताखों पर अब बस रंगीन कागज़ बिछा था| जैसे ही उसने सबसे ऊपरवाले ताख पर बिछे रंगीन कागज को हटाया, उसे एक लिफ़ाफ़ा नजर आया | उसने लिफ़ाफ़ा खोलकर देखा और उसमें रखे कागज़ के पन्नों को पढते ही वह अवसाद की किसी गहरी खाई में गिर गया | इतने सालों तक जिस माता-पिता पर अभिमान करता रहा, वह तो उसके अपने माता-पिता ही नहीं थे| उसे किसी अनाथालय से गोद लिया गया था| एक साथ न जाने कितने प्रश्न उभर आए उसके जेहन में | थोड़ी देर बाद खुद को संभालता हुआ वह उठ खड़ा हुआ, जेब से माचिस निकालकर पहले सिगरेट सुलगाया और फिर जलती हुई उस तीली को अनाथालय के उस कागज़ पर गिरा दिया| उसने तय किया कि वह इस बाबत अपने किसी रिश्तेदार से कुछ नहीं पूछेगा| पूछता भी तो क्या ! उसे तो यह भी नहीं पता कि यह सच्चाई किसी और को पता भी है या नहीं| यहाँ तक कि उसने यह खबर माधुरी तक से भी साझा करने की जरुरत नहीं समझी| 

माधुरी उस ट्रेनिंग सेंटर की रिसेप्शनिस्ट थी जहाँ अद्वैत पढ़ाता था| उसी ट्रेनिंग सेंटर में सुजाता पढ़ने आती थी जिससे अद्वैत प्रेम कर बैठा था |अभी सुजाता की पढ़ाई ख़त्म होने में वक़्त तो था पर सुजाता के घरवाले उसके लिए वर तलाशने का काम शुरू कर चुके थे| आगे कोई अनहोनी न हो, यही सोचकर एकदिन अद्वैत और सुजाता ने अदालत जाकर विवाह कर लिया| माधुरी के साथ-साथ अद्वैत के घरवाले इस विवाह के साक्षी बने| तय हुआ कि जब सुजाता की पढाई ख़त्म हो जायेगी, तब इस शादी का राज़ सुजाता के घरवालों के सामने खोला जाएगा| अदालत में हुई शादी के बाद सुजाता अपने घर लौट गई और अद्वैत अपने घरवालों के साथ अपने घर| अगले सात-आठ महीनों तक सब ठीकठाक चलता रहा| सुजाता ट्रेनिंग सेंटर आती और शाम में अद्वैत के साथ थोड़ा वक़्त बीताकर अपने घर लौट जाती| फिर एक दिन वही हुआ जिसका डर था| सुजाता के घरवालों ने उसकी शादी तय कर दी| कोई चारा न देख, सुजाता ने घरवालों से अपनी शादी की बात बता दी | उसके घरवालों ने वकील से विमर्श किया, तलाक के कागज़ बनावाकर उस पर जबरन सुजाता से दस्तखत करवाया और फिर कुछ परिजनों के साथ अद्वैत के घर जा पहुँचे| अद्वैत प्यार के लिए मर सकता था और मार भी सकता था ; पर तलाक के कागज़ पर सुजाता के दस्तखत देखने के बाद वह  टूटकर बिखर गया| उसने भी चुपचाप उस कागज़ पर दस्तखत कर दिया और अवसाद के चादर ओढ़कर सो गया| अब वह न किसी से कुछ कहता और न किसी के कुछ पूछने पर जवाब ही देता| उसे इस अवसाद से बाहर निकालने में सबसे ज्यादा मदद की उसके चचेरे भाई  अनुकल्प ने| अनुकल्प हर शाम अद्वैत  को लेने ट्रेनिंग सेंटर आ जाता और फिर उसे लेकर कभी सिनेमा तो कभी थियेटर पहुँच जाता| जब अद्वैत  कहीं जाने से मना कर देता, तो ट्रेनिंग सेंटर के सामने वाले पार्क में बैठकर दोनों देर तक बातें करते| कभी अद्वैत के क्लास ख़त्म होने  में समय लगता, तो अनुकल्प रिसेप्शन पर बैठकर उसका इन्तजार करता| धीरे-धीरे माधुरी से उसकी दोस्ती हो गई और फिर कुछ महीनों में दोस्ती प्यार में तब्दील हो गई| इसी दौरान अद्वैत को पता चला कि नशे की लत ने किस कदर अनुकल्प को अपने गिरफ्त में ले लिया है| उसने कई बार अनुकल्प को समझाया कि सिगरेट तक तो ठीक है पर स्मैक और हेरोइन से उसे दूर रहना चाहिए; पर नशे की लत एकबार लग जाए, तो इतना आसान कहाँ होता है इससे पीछा छुड़ाना| 

देखते -देखते दो साल बीत गए| अद्वैत ने तय कर लिया था कि वह फिर दूसरी शादी कभी नहीं करेगा| वह सुजाता को भुला ही नहीं पाया था| अब अनुकल्प ट्रेनिंग सेंटर आता और सिगरेट पीने के बहाने थोड़ी देर अद्वैत के साथ सामने वाले पार्क में बिताने के बाद माधुरी के साथ घूमने निकल जाता| सावन का महीना रिमझिम के तराने लेकर आ चूका था| माधुरी और अनुकल्प घर लौटते हुए कई दिनों से बारिश में भींग रहे थे| फिर अनुकल्प एकदिन बीमार पड़ा| बुखार के साथ पेट दर्द की शिकायत थी| मोबाईल फोन उन दिनों भारत नहीं पहुंचा था| अद्वैत ने जब माधुरी को अनुकल्प की तबियत खराब होने की खबर दी, तो माधुरी ने बताया कि उसे भी हल्का बुखार रह रहा है और उल्टियाँ हो रही हैं | शायद बारिश में भींगने की वज़ह से ऐसा कुछ हुआ हो, ऐसा ही अंदेशा था दोनों का |

पहले अनुकल्प के घर के लोगों को यह मौसमी बुखार लगा जो अमूमन पेट दर्द के साथ ही आता है, पर जब उसे साँस लेने में तकलीफ होने लगी और स्थिति बद से बदतर होती चली गई, उसे शहर के सबसे बड़े अस्पताल में भर्ती करवाया गया|  डॉक्टर ने रक्त जाँच की रिपोर्ट के बाद ही बता दिया कि नशे की लत उसे अपना ग्रास बना चुकी है| तेरह दिनों तक चली जिंदगी और मौत के बीच छिड़ी जंग में जिंदगी हार गई | 

अद्वैत फिर से अवसाद में चला गया| एक अनुकल्प ही तो था जो उसके इतने करीब था| वह भाई कम, दोस्त ज्यादा था| अनुकल्प की मौत के बाद वह पंद्रह दिनों तक ट्रेनिंग सेंटर नहीं गया| फिर एक दिन घरवालों ने उसे समझाकर भेजा| 

ट्रेनिंग सेंटर पहुँचते ही उसका सामना माधुरी से हुआ| वह माधुरी से आँखें चुराकर सीधे क्लास रूम में प्रवेश कर जाना चाहता था पर माधुरी ने आवाज देकर पहले उसे रोका और फिर एक कठिन सवाल अद्वैत की ओर उछाला "अनुकल्प अब कैसा है"

पहले तो अद्वैत किंकर्तव्यविमूढ़ हो मूक खड़ा रहा, फिर खुद को संभालता हुआ माधुरी को क्लास के बाद पार्क में मिलने के लिए कहा| अगले दो घंटों तक तरह-तरह के कयास लगाकर माधुरी का दिमाग सुन्न पड़ चुका था कि तभी अद्वैत को क्लास से बाहर आता देख वह पार्क के लिए निकल पड़ी| 

"अनुकल्प कैसा है और आपने मुझे पार्क में क्यूँ बुलाया" माधुरी का धैर्य जवाब दे चूका था|

"अनुकल्प को सभी परेशानियों से मुक्ति मिल गयी | वह अब इस दुनिया में नहीं रहा" अद्वैत ने माधुरी के सर पर हाथ फेरते हुए कहा|

माधुरी पिछले दो घंटों से वैसे ही कशमकश में थी और अचानक से जो कुछ भी उसने सुना, उसे सह पाने की शक्ति शायद उसमें नहीं बची थी| वह बेहोश हो गयी| अद्वैत घबराकर पार्क में लगे फव्वारे से पानी लाकर माधुरी के चेहरे पर छिड़कने लगा|  थोड़ी देर बाद जब माधुरी को होश आया तो वह बुदबुदा रही थी "मुझे भी अब मर जाना होगा...और कोई चारा नहीं.."

"संभालो खुद को माधुरी| मुझे पता है तुम पर क्या गुजर रही है, पर इस सच को स्वीकार करना ही होगा" अद्वैत ने समझाते हुए कहा |

"आपको कुछ नहीं पता....कुछ भी नहीं " माधुरी विलाप किए जा रही थी|

"क्या बात है...क्या नहीं पता.. " अद्वैत ने पुछा |

"मैं माँ बनने वाली हूँ, अनुकल्प को बता भी नहीं पायी..." माधुरी बेतहाशा रो रही थी| 

यह सुनते ही पहले तो अद्वैत के पैरों तले की जमीन खिसक गयी, फिर उसके मुँह से अचानक निकला "अब"?

कुछ प्रश्नों के कोई जवाब नहीं होते | यह प्रश्न भी ऐसा ही था | माधुरी निरुत्तर बैठी रही | 

थोड़ा ठहर कर अद्वैत ने कहा "चलो"

"कहाँ" माधुरी दिशाहारा थी|

"वहाँ, जहाँ तुम और अनुकल्प की अमानत सुरक्षित रह सको"  कहता हुआ अद्वैत आगे बढ़ने लगा |

"पर ऐसी कौन सी जगह होगी" माधुरी को कुछ भी समझ नहीं आ रहा था |

"मेरा घर" कहता हुआ अद्वैत रुक गया |

"ऐसा कैसे हो सकता है? लोग क्या कहेंगे? आप क्या जवाब देंगे?" माधुरी ने सवालों की लड़ी लगा दी थी|

"परेशान होने की जरुरत नहीं| हम आज ही शादी करेंगे और फिर तुम मेरे घर रहने आ जाओगी" अद्वैत के चेहरे पर आत्मविश्वास था|

"पर..."

माधुरी वाक्य पूरा कर पाती, उसके पहले ही अद्वैत ने कहा "चिंता मत करो | यह सिर्फ दुनिया को दिखाने के लिए होगा | तुम हमेशा अनुकल्प की अमानत ही रहोगी और बच्चे के आ जाने के बाद मुझे भी अनुकल्प नए दोस्त के रूप में मिल जाएगा "

माधुरी अद्वैत के साथ चल पड़ी और फिर उसके साथ रहने लगी | अद्वैत को रिश्तेदारों के ताने सुनने पड़े, पर वह चुप रहा | कुछ समय बाद वह माधुरी और बच्चे को लेकर दुसरे शहर चला गया | नए शहर में माधुरी ने भी अपने लिए एक नौकरी का इंतजाम कर लिया | बच्चे के स्कूल में पिता के नाम की जगह अद्वैत ने अपना नाम लिखा | माधुरी नौकरी और बच्चे में व्यस्त हो गयी और अद्वैत ने भी उन दोनों की देखभाल में कोई कमी नहीं छोड़ी |  महीने दर महीने और साल दर साल बीतते रहे | अद्वैत ने खूब तरक्की की, गाड़ी और घर के अतिरिक्त भी सुख -सुविधा के तमाम साधनों का इंतजाम किया | नहीं खरीद पाया, तो अपने लिए प्यार | खरीदता भी कैसे ! प्यार को भी भला रुपया-पैसों से खरीदा जा सकता है !! वह घर में सामान भरता रहा और उसके मन का महल खाली ही रहा | उसने खुद को दफ्तर के कामों में बेतरह व्यस्त कर लिया था |

वह जून की एक दोपहर थी जब कई सालों बाद अद्वैत की मुलाक़ात उसके पिछले दफ्तर में काम करने वाली शालिनी कौशल से हुई | 

"अरे! कैसी हो शालिनी? पूरे नौ साल हो गए, अब भी वैसी ही दिखती हो" अद्वैत का चेहरा खिल उठा था 

शालिनी ने आदतन मुस्कुरा कर नजरें झुका लीं थी | 

"चलो, किसी कॉफ़ी शॉप पर बैठते हैं" अद्वैत ने कहा और कॉफ़ी शॉप की ओर मुड़ गया |

दोनों कॉफ़ी शॉप गए, दो कैपेचीनो आर्डर किया और एक-दुसरे का हाल समाचार पूछा | बातों ही बातों में शालिनी ने बताया कि दिल की बायपास सर्जरी के वक्त उसने यह सोचकर इस्तीफ़ा दे दिया था कि उसका पति कौशल उसको और घर को, दोनों को संभाल लेगा , पर अब घर की स्थिति बद से बदतर होती देख उसने नौकरी का निर्णय लिया और अब वह नौकरी की तलाश कर रही थी| अद्वैत ने शालिनी से कहा कि उसे आराम करना चाहिए और वह कौशल के लायक कुछ काम का बन्दोवस्त कर सकता है| शालिनी ने एक अन्तराल के बाद बताया कि उसने गलत इन्सान को अपना जीवन साथी बना लिया था जिसका खामियाजा वह आज तक भुगत रही है| वह नशे की लत का शिकार है, घर पर ही रहता है और आए दिन उससे मारपीट करता रहता है| 

"ओह ! पुलिस की सहायता क्यूँ नहीं लेती" अद्वैत ने जल्दबाजी में कहा |

"कोशिश की थी, कुछ नहीं हुआ | हर ओर से मुझे ही ज्ञान मिला | खैर, छोड़िये इन बातों को | आपके दफ्तर में मेरे लायक कोई नौकरी हो तो ..." शालिनी ने कातर होकर कहा |

"जरूर | जो कुछ मुझसे बन पड़ेगा, करूँगा | " अद्वैत ने उसे आश्वस्त करते हुए कहा |

थोड़ी देर तक दोनों चुपचाप कॉफ़ी पीते रहे और फिर अद्वैत ने मौन तोड़ते हुए दार्शनिक अंदाज में कहा "कितनी अजीब बात है न कि इतने सालों से परिचित हैं हम और एक-दुसरे के बारे में कुछ भी नहीं जानते | एक ही दफ्तर में आजू-बाजु बैठकर सुबह से शाम न जाने कितनी बातें की होंगी हमने, पर एक-दुसरे के जीवन का यह रंग हम देख ही न पाए | एक बात है जो मुझे पिछले कुछ महीनों से भीतर ही भीतर खाए जा रही है| किसी से बता सकूँ, ऐसा कोई इन्सान जिंदगी में नहीं है| आज तुम्हारे जीवन के एक नए पहलू से वाकिफ़ हुआ, तो लग रहा है कि अपने जीवन का काला सच तुम्हें बताकर इस बोझ से मुक्ति पा लूँ | 

"कैसा सच !" शालिनी अवाक् थी |

अद्वैत ने उसे बताया कि किस तरह पिता की मृत्यु के बाद उसे अपने अनाथ होने का पता चला था और वह टूट गया था | उसने अपने और माधुरी के बीच का सच भी बताया| 

"मैं काफी हल्का महसूस कर रहा हूँ अब" अद्वैत ने दीर्घ निश्वास लेते हुए कहा |

कुछ देर बाद दोनों अपने-अपने घर लौट गए |

अब अद्वैत फोन के मार्फत शालिनी का हाल समाचार लेता रहता था | कई जगह शालिनी की नौकरी के लिए उसने बात भी की | फिर एक दिन उसने शालिनी से फोन पर ही कहा "हमारे दुःख एक जैसे हैं| तुम अपने संसार में अकेली हो और मैं अपने संसार में | इतने सालों के बाद इस तरह अचानक मिलना, ऊपरवाले की साजिश भी तो हो सकती है! "

"मैं कुछ समझी नहीं" शालिनी शायद समझ ही गयी थी |

"मैं तुम्हें तब से पसंद करता हूँ जबसे तुम हमारे पिछले दफ्तर नौकरी के लिए पहले दिन आयी थी| संयोग था कि हम आस-पास ही बैठे और खूब बातें भी की| तुम शादीशुदा थी, तो इसलिए कभी मन की बात तुमसे कह नहीं पाया | अब जब जान गया हूँ कि तुम किसी शादी में नहीं, बल्कि धोखे में जी रही हो, क्या ऐसा नहीं हो सकता कि हम एक हो जाएँ और हम दोनों की समस्या ही खत्म हो जाए| तुम्हें आराम चाहिए और मुझे तुम्हारा साथ | क्या कहती हो?" अद्वैत की आवाज में आत्मविश्वास था |

"तो माधुरी !!" शालिनी को न जाने क्यूँ अद्वैत का ऐसा पूछना अटपटा लगा |

"वो मुझे तलाक दे देगी | अब उसका बच्चा बड़ा हो गया है| नौकरी भी पहले से बेहतर है| उसे मेरी जरुरत नहीं| तुम बताओ" अद्वैत जैसे सब सोचकर ही बैठा था |

"मैं एक विचित्र सी मनोदशा से होकर गुजर रही हूँ और ऐसी मनोदशा में कुछ भी कहना ठीक न होगा" कहते हुए शालिनी ने फोन काट दिया |

शालिनी ने अद्वैत से बात करना बंद कर दिया | शालिनी की परिस्थितियों से जो भी अवगत होता, वह अपनी कोई दुखभरी कहानी सुनाकर उसके करीब आने की कोशिश करता और अब अद्वैत की बातें भी शालिनी को ठीक उन्हीं की तरह लग रही थी | जब भी वह फोन करता, बस काम की बात कर वह फोन रख देती | अद्वैत भी उससे आगे कुछ नहीं कहता | फिर एकदिन अद्वैत की मेहनत ने रंग दिखाया और शालिनी को नौकरी का बुलावा आया | दो इंटरव्यू और नौकरी पक्की | 
शालिनी ने खुश होकर अपनी ख़ास सहेली और राजदार सोनाली को फोन लगाया तो उसने कहा "अद्वैत सही इन्सान है तुम्हारे लिए |"

शालिनी अब नौकरी में व्यस्त हो गयी थी, पर अद्वैत के प्रति वो सम्मान जगा था उसके मन में, वह अद्वैत को अक्सर फोन कर लेती और उसका हाल-समाचार पूछ लेती | इसी बीच बातों ही बातों में अद्वैत ने शालिनी से कहा था कि वह समझ गया है कि वह उसके दोस्त से ज्यादा कुछ नहीं है|  शालिनी को जब भी जरूरत पड़ती, अद्वैत हाज़िर हो जाता | महीने में एक -दो बार मिलना भी हो जाता | शालिनी उस पर भरोसा करने लगी थी | अद्वैत शालिनी के बदले हुए व्यवहार देखकर कभी - कभार पुराना सवाल दाग दिया करता था | शालिनी के असमंजस को देख कहता कि उसे कोई जल्दी नहीं है, वह आजन्म इन्तजार कर सकता है|

मार्च की एक दोपहर शालिनी ने अद्वैत को बताया कि कौशल उसे तलाक देने को राजी हो गया है| अद्वैत खुश हुआ | अगले एक साल तक दोनों दोस्त की तरह ही मिलते रहे | एक दिन शालिनी ने उसे बताया कि तलाक की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है और वह अब आज़ाद है| सुनते ही अद्वैत ने पूछा " तो अब शादी ?"

"हम्म..."मुस्कुराते हुए शालिनी ने कहा |

"तो मैं भी तलाक की अर्जी डाल दूँ अब" अद्वैत ने आत्मविश्वास से कहा |

"अरे नहीं | मैं तुम्हें कबसे बताना चाहती थी, पर तुमने मेरे लिए इतना कुछ किया कि जब भी बताना चाहा तुम्हारे प्यार को देखकर चुप हो गयी | मैं तुम्हें दुखी नहीं करना चाहती थी | दो साल पहले एक कार्यक्रम में मेरी मुलाक़ात नवोदित से हुई थी | वो तलाकशुदा है और हम काफी हद तक एक जैसे हैं| दो-चार मुलाकातों के बाद ही हम दोनों को लगा था कि हमें एक-दुसरे का हाथ थाम लेना चाहिए | कौशल तलाक के लिए नहीं मान रहा था | अब जाकर सब खत्म हुआ | नवोदित ने अगले महीने की तीन तारीख का दिन तय किया है| समझ सकती हूँ तुम्हें बहुत बुरा लग रहा होगा, पर दिल का मामला दिल ही निपट लेता है| कमबख्त नाम का ही हमारा होता है| वहाँ कौन है, हम यह तब जान पाते हैं जब अगला वहाँ सेंध लगाकर फ़ैल चूका होता है| तुम समझ रहे हो न ... आई एम् सॉरी" शालिनी सफाई देती रही |

"अरे वाह ! चलो पार्टी करते हैं| यह बात बता सकती थी तुम पहले भी | उसको भी बुलाओ | यह तो बहुत खुशी की बात है" अद्वैत ने मुस्कुराते हुए कहा |

"तुम्हें सचमुच बुरा नहीं लगा ?"शालिनी अद्वैत के लिए चिंतित थी |

"क्यों लगेगा बुरा भला ? इसलिये कि तुम मेरी न हो सकी ? इतना ही तो चाहता हूँ तुम्हारे लिए कि तुम खुश रहो | क्या फर्क पड़ता है कि खुशी का जरिया मैं बनूँ या नवोदित ? जिंदगी ने मुझे समझा दिया है कि प्रेम में जिसे चाहते हैं, उससे कुछ नहीं चाहते | यु सी, नियति ने मेरे हिस्से महान बनना लिखा है| पर एक बात कान खोलकर सुन लो | अब अगर नवोदित ने तुम्हें किसी प्रकार का दुःख दिया, तो मैं उसे तुम्हारे घर आकर मारूँगा " अद्वैत ने हँसते हुए कहा |

शालिनी की आँख भर आयी | उसने अद्वैत का हाथ अपने हाथों में लेकर कहा " तुम नाम से ही नहीं, काम से भी अद्वैत हो| अपने लिए कभी सोचते ही नहीं| हमेशा दूसरों के लिए ही.."

"एक जरूरी काम आ गया है| मुझे जाना होगा " अद्वैत ने शालिनी की हाथों से अपना हाथ खींचते हुए कहा और पलट कर जाने लगा  |

"कभी कोई जरुरत पड़ी या मैंने मिलने बुलाया तो आओगे" शालिनी इतना अच्छा दोस्त नहीं खोना चाहती थी |

"मैं मनुष्यों में गधा हूँ और गधों में गर्धवराज | जब मनभर बोझ तैयार हो जाए, आवाज देना " अद्वैत ने बिना पलटे ही जवाब दिया और आगे बढ़ गया | आँखों के आँसुओं को छुपा लेना बेहद जरूरी था उस वक़्त | 

Wednesday, January 17, 2018

कर्तव्य

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अगर डाक विभाग अब भी बंद नहीं हुआ, तो  शायद उन पिछड़े गाँवों की वज़ह से जहाँ आज भी कोरियर सर्विस उपलब्ध नहीं है| 

मधुरा की तबियत ठीक नहीं चल रही थी| डायबिटिक न्यूरोपैथी आपको अंदर ही अंदर इतना हिलाती-डोलाती रहती है कि अगर आपके पाँव के नीचे की धरती डोल भी जाए, तो भी आपको कुछ पता नहीं चलता| आप समाज के साथ मिलकर हिलने-डोलने के सुख से वंचित रह जाते हैं|

पोस्टमैन ने फोन करके कहा "आपका पार्सल आया है| गाड़ी भिजवाइये या आकर ले जाइए"| 

मधुरा ने  पूछा "ये नियम कब लागू हुआ कि जिसका पार्सल है वो गाड़ी भिजवाएगा या आकर ले जाएगा"| 

पोस्टमैन: "मदद माँग रहा हूँ"| 

मधुरा : "मैं बीमार हूँ और घर पर कोई नहीं है| मेरी मदद कीजिये"| 

पोस्टमैन: "ठीक है फिर"

मधुरा : "तो अब आप कब आएँगे"

पोस्टमैन: "देखेंगे| दो-तीन दिनों में जब फुर्सत होगी| हमारे पास बहुत काम है" 

ऐसा कहकर पोस्टमैन ने फोन रख दिया| कुछ दिनों तक पार्सल रखकर गाड़ी भिजवाने या खुद आकर ले जाने का आग्रह करता रहा | मधुरा के कई बार यह बताने पर कि वह बीमार है और नहीं आ सकती, एक ही वाक्य दोहराता रहा कि वह व्यस्त है और जब समय होगा, पार्सल दे जाएगा इसी बीच मधुरा ने ट्विटर पर केंद्रीय दूरसंचार मंत्री, इंडिया पोस्ट और प्रधानमंत्री कार्यालय को संबोधित करते हुए कई ट्वीट किया जिसका कोई नतीजा नहीं निकला| 

कई दिन बीत जाने के बाद एक संध्या जब मधुरा ने इंडिया पोस्ट की ट्रैकिंग साईट पर चेक किया, तो स्टेटस देखकर हैरान थी| लिखा था "डिलीवरी अट्टेम्पटेड, डोर क्लोज्ड" जबकि वह घर पर ही थी| मधुरा ने डाक बाबू को फोन कर पूछा कि स्टेटस में ऐसा क्यूँ लिखा है| उन्होंने इतना कहकर फोन रख दिया "मेरी तबियत खराब थी, इसलिए नहीं आया| अब कुछ तो स्टेटस डालना पड़ता, इसलिए ये डाल दिया"|  

मधुरा के गुस्से का ठिकाना न रहा और इसबार उसने फिर से फोन मिलाकर कहा "जानकर दुःख हुआ कि आपकी तबियत खराब है| कल तक ठीक हों जाएँ, तो मेरा मेरा पार्सल अवश्य डिलीवर कर दें वरना गणतंत्र दिवस  के दिन हमारी अब तक की बातचीत की रिकार्डिंग मैं मेरे प्यारे देशवासियों को सुनाउंगी और उनसे आग्रह करूँगी कि आपकी तीमारदारी करे| आखिर एक सरकारी कर्मचारी की अस्वस्थता का सवाल है जिसकी सैलरी हमारे टैक्स के पैसों  से आती है|" 

इतना सुनते ही घबराकर उन्होंने कहा "मुझे मेरा कर्तव्य समझाने के लिए धन्यवाद" और फोन रख दिया|  

अंततः गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर डाक बाबू को उनका मूल कर्तव्य समझ में आ गया और मधुरा को उसका पार्सल मिल गया | 

Monday, January 1, 2018

सपने में नींद

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महानगरों में समय से दफ़्तर पहुँच जाना भी बड़ी बात है| दफ़्तर में समय से पहुँचने में समय प्रबंधन तब तक ही काम आता है जब तक आप घर से निकल नहीं जाते | अमूमन इस समय प्रबंधन में नींद की कटौती शामिल होती है| एकबार घर से निकल गए तो फिर मौसम, धार्मिक जुलूस, धरना प्रदर्शन, खराब ट्रैफिक सिग्नल जैसी कई चीजें समय प्रबंधन के आड़े आ जाती हैं| ऐसे ही किसी दिन घर से दफ़्तर को निकली और लगभग बारह किलोमीटर चलने के बाद जाम में फँसकर याद आया कि उस रोज शिवरात्रि का उत्सव था | साढ़े तीन घन्टे जाम में फँसकर और जगह -जगह पर कानफाडू बोलबम डीजे सुनने के बाद सोचती रही कि क्या भोले के भक्त इतने भोले होते हैं कि जिसके गले में पहले से ही ज़हर है, उसके कानों में भी ज़हर घोलकर पुण्य कमाने का भ्रम पालते हैं!!


२००८ में शिवरात्रि के समय मदुरै में थी| कहा जाता है वहाँ के मीनाक्षी मंदिर में हुई थी शिव और पार्वती की शादी| आज भी लोग शिवरात्रि के दिन शिव जी की बारात लेकर जाते हैं और वैगई नदी किनारे इस पर्व को गाजे -बाजे के साथ मनाते हैं| एक तो उनके द्वारा बजाए जानेवाले वाद्ययंत्र यंत्र पारंपरिक थे और सबसे सुन्दर बात यह थी कि यह बारात रास्ते के किनारे शांतिपूर्ण तरीके से चल रही थी; बिना किसी को असुविधा पहुँचाये| धर्म के नाम पर पागलपन नहीं बल्कि एकप्रकार की उत्सवधर्मिता दिखी| शिव की सहिष्णुता को आत्मसात करते लोग दिखे थे|


गाज़ियाबाद के दूधेश्वरनाथ महादेव मठ मंदिर में पिछले कुछ सालों से औसतन चार से पाँच लाख कांवड़ियों के जलाभिषेक करने की खबर आती रही है। भोले के इन भोलों को सम्भालने के लिए तीन हजार स्वयंसेवक भी परिश्रम करते आ रहें हैं| शिव ठहरे परम ज्ञानी | ऐसे में शिव जी न तो एक्सप्रेसवे के कंक्रीट में फंसने आते हैं और न ही एन एच २४ के नरक में धंसने | नौकरीपेशा लोगों को अपना ख्याल खुद ही रखना पड़ता है|


देर से दफ़्तर पहुँचने पर आधे दिन की तनख्वाह कटने और देर तक काम करने के अतिरिक्त जो खामियाजा भुगतना पड़ता है, उनमें कार पार्किंग की जगह का उपलब्ध न होना प्रमुख है| हम एक ऐसे समय के गवाह बने जब गौ भक्ति अपने चरम पर थी| इस भक्ति में परवाह कतई नहीं थी | गौ भक्तों ने अपनी तथाकथित माताओं को प्लास्टिक और कूड़ा खाने के लिए सड़कों पर छोड़ दिया और पिता सांड की कभी खबर तक नहीं ली। सरकार के एजेंडे में भी ऐसा कुछ शामिल नहीं किया गया जिससे इन जानवरों को सड़कों से हटाया जा सके। तमाम परेशानियाँ आम जनता के हिस्से आती है। नॉएडा सेक्टर 2 में कई जगह एक साथ दस-बारह की झुण्ड में गाय और सांड दिखेंगे। उस रोज दफ्तर के बाहर पार्किंग में दो सांड आपस में लड़ते रहे और उनकी धींगामुश्ती में एक सांड का सिंग मेरी कार के टेल लैंप में घुस गया और टेल लैंप उसकी सिंग के साथ ही बाहर आया। फिर उनकी धक्का मुक्की में कार का एक हिस्सा भी क्षतिग्रस्त हो गया | दिल दुखी था और दिमाग सोच रहा था कि पहले तो कार एक्सेसरीज पर सर्विस टैक्स या वैट भी नहीं लगता था, अब तो जीएसटी नामक संकट इन पर भी लागू हो चुका था। पर उस समय माहौल को देखते हुए यह नहीं कह सकती थी कि मंहगाई बढ़ी है, तो बस इतना ही कह पायी थी कि चीजों के दाम बढे हैं। अगले कई घंटे इसी गम में बीत गए और घर लौटने की बारी आई|


कक्षा आठ में अल्फ्रेड जॉर्ज गार्डिनर का लिखा आलेख "ओन सेयिंग प्लीज" पढ़ा था| इस आलेख में उन्होंने कई उदाहरण देकर यह बताने की कोशिश की है कि आदतें (अच्छी और बुरी, दोनों) संक्रामक होती हैं| 'कृपया' और 'धन्यवाद' जैसे शिष्टाचार के शब्द जीवन को सुगम बनाने में मदद करते हैं। सेक्टर दो, नॉएडा में जाम लगा था| वह रास्ता टू वे तो है पर उस रास्ते पर डिवाइडर नहीं है| मैं ऑफिस के बाहर खड़ी अपनी कार बैक कर ही रही थी कि कुछ गाड़ियाँ जिन्हें दायीं ओर की कतार में चलना था, वह लाइन तोड़कर बायीं ओर आने लगी| जब तक मैं गाड़ी सीधा करती, पीछे से पुलिस की गाड़ी भी गलत कतार में आ खड़ी हुई| झल्लाती हुई पुलिस वाली गाड़ी की ओर देखते हुए मैंने कहा "कुछ नहीं हो सकता इस देश की ट्रैफिक समस्या का| जब पुलिसवाले ही नियम नहीं मानेंगे तो और किसी से क्या उम्मीद"| मेरी कार का शीशा नीचे था| यह तो नहीं मालूम कि उस गाड़ी में बैठे लोगों को मेरी बात सुनाई दे गयी या उसमे बैठे सीनियर पुलिस ऑफिसर ने मेरा चेहरा पढ़ लिया, वह गाड़ी से नीचे उतरे| फिर उन्होंने आसपास लगी गाड़ियों को वापस दायीं ओर भेजा| फिर अपने ड्राईवर से भी साइड होने को कहा और मेरी कार निकलवाकर ही अपनी गाड़ी में बैठे| मैं बेहद खुश हुई और उन्हें धन्यवाद ज्ञापित करते हुए आगे बढ़ी ही थी कि फिर से कुछ लोग दायीं ओर की कतार छोड़ बायीं ओर आ गए| मुझे फिर गाड़ी रोकना पड़ा| मैं लोगों को कतार में चलने की नसीहत दे रही थी | इसबार एक ऑटो में चालक के पास बैठे भद्रलोक उतरे और उन्होंने ठीक वही किया जो उनसे चार गाड़ी आगे खड़े पुलिस ऑफिसर ने किया था| मैंने उनसे भी धन्यवाद कहा और आगे बढ़ गयी| सौ लोगों की भीड़ में ऐसे दो लोग भी जब तक मौजूद हैं, उम्मीद बंध ही जाती है कि एक दिन हमारा समाज अच्छी आदतों से भी संक्रमित होना सीख लेगा| दफ़्तर जाते हुए मन खिन्न हो गया था पर लौटते हुए उम्मीदों का उजाला दिखा और मन शांत हुआ| शांत मन आत्ममंथन करता है; तो मैंने भी किया- आत्ममंथन | तय किया कि अगले दिन से मैं अपनी कार लेकर दफ़्तर नहीं जाऊँगी और सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल करुँगी| फिर सार्वजनिक परिवहन इस्तेमाल करने के कई फायदे भी खुद को गिनाए और एक वाकया भी याद आया|


एक दिन दफ्तर के कुछ लोग दो अलग गाड़ियों में घूमने गए। हम भी गए थे । जाते हुए अपनी कार दफ्तर में ही छोड़ गए थे। चूँकि सभी साथ गए और साथ ही लौटना भी था, तो जिसे जो पार्किंग मिली, वहीं गाड़ी लगा दी। हमें लौटते हुए बड़ी देर हो गयी और हम पहले आ गए। बाकी जनता हमसे बहुत दूर जाम में फँसी रही। रात के दस बज चुके थे। दफ्तर तो पहुँच चुकी थी, पर मेरी कार के पीछे जिनकी कार लगी थी, वो तो जाम में फँसे हुए थे। पता था कैब बुक करने का कोई फायदा नहीं, फिर भी किया। वही हुआ, जो होना था। कैब नहीं आई। ग्रेटर नॉएडा से नॉएडा आने के लिए कैब मिल जाती है पर वापस जाना हो तो बमुश्किल ही कोई राज़ी होगा। याद आया आखिरी मेट्रो के आसपास बोटैनिकल गार्डन से परी चौक तक के लिए एक बस चलती है। एक मेनेजर से आग्रह किया तो वह हमें वहाँ छोड़ आए। हम बस में बैठ झपकी लेते हुए परी चौक पहुँचे और फिर ऑटो लेकर घर पहुँचे। पता चला नींद महँगी शय है। घर से दफ्तर तक की ज़िम्मेदारी पूरी करते हुए जो चीज अधूरी रह जाती है, वह है नींद।


अब अगले रोज़ दफ्तर आने के लिए पहले ऑटो लिया। झपकी लेते हुए परी चौक पहुँचे। फिर बस पर खिड़की वाली सीट पर बैठकर सो गए। बोटैनिकल गार्डन पर उतरकर फिर ऑटो में बैठ आँखें मूँद ली। ऑफिस की सीढियाँ चढ़ते हुए मन ही मन योजना बन चुकी थी कि अब हर रोज़ ऐसे ही सोते हुए दफ्तर पहुँचा जाएगा। कार का इस्तेमाल सिर्फ बारिश के मौसम में किया जाएगा। दफ्तर में प्रवेश करते ही घड़ी पर नजर पड़ी और मेरे सोने का सपना टूट गया। जिस दूरी को अमूमन ४५ मिनट के समय में तय करती थी, तीन गाड़ियाँ बदलकर दफ्तर पहुँचने में मुझे उस रोज डेढ़ घंटे लगे !!


उस रोज़ के बाद दफ्तर जाते हुए पूरे रास्ते अपने टूटे सपने के बारे में सोचती हूँ। सोचती हूँ कि किसी रोज़ मेरे घर के पीछे एक मेट्रो स्टेशन होगा और मैं नींद पूरी करते हुए दफ्तर पहुँच जाऊँगी। लोग नींद में सपना देखते हैं और मैं सपने में नींद देखती हूँ!

Saturday, December 16, 2017

दंगा-ए-शहर मुश्किल-ए-नौकरी

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वह सन २०१७ के अगस्त महीने की पच्चीस तारीख थी | दिन था शुक्रवार | टीवी में समाचार देखते हुए सुबह नाश्ता किया| पिछले चंद दिनों से पंचकुला में बाबा राम रहीम के समर्थक और पुलिस के बीच झड़प की खबरें आ रहीं थीं| बलात्कार के आरोप की पुष्टि के बाद बाबा राम रहीम की गिरफ़्तारी और डेरा सच्चा सौदा के ठिकानों पर सरकारी छापे के बाद झड़प ने दंगे का रूप ले लिया था | समाचार खत्म होने से पहले नाश्ता ख़त्म हुआ और दौड़ते-भागते मैं दफ्तर पहुँची|

दफ्तर से मैं और मेरी टीम की एक सॉफ्टवेर इंजिनियर कैंसर से जुड़े एक प्रोजेक्ट का डेमो देने एम्स गए | हमारे एम्स पहुँचने से पहले बारिश शुरू हो चुकी थी| जिन चिकित्सकों की टीम से मिलने हम गए थे, वह किसी दूसरी बिल्डिंग में किसी कार्यक्रम के स्पीकर थे| बारिश के चलते उन्हें उस भवन से कैंसर भवन तक आने में वक्त लगा| मीटिंग देर से शुरू हुई| एक डॉक्टर साहब मिले जो अमेरिका में ओवेरियन ऑन्कोलॉजी पर शोध कर रहे थे। मोदी जी का दमदार भाषण सुना, देशभक्ति जागी और गाड़ी, बंगला सब छोड़ भारत आ गए। एम्स में कैंसर के नए उपचार शुरू करने जा रहे थे। बहुत मायूस हो कह रहे थे इस देश की जनता में साइंटिफिक सोच डेवलप करने में न जाने कितने वर्ष लग जायेंगे। किडनी के संक्रमण से अधमरे मरीज को साथ लाने वाला रिश्तेदार ओपीडी में बैठा थूक देता है। वो कहते हैं वो अपना तीस प्रतिशत समय लोगों को साफ सफाई के बारे में जागरूक करने में देते हैं। डेरा सच्चा वाले प्रकरण से आहत होकर बोले "कहाँ इस देश को बाबा चाहिए और कहाँ मैं मोटी कमाई और लंबी गाड़ी छोड़ सरकारी अम्बसडर में घूम रहा हूँ। बताओ ये लोग किसी फर्जी बाबा के लिए मर रहे हैं और यहाँ अस्पताल में न जाने कितने मरीज इसलिए मर रहे हैं कि उन्हें ऑर्गन डोनर नहीं मिल रहा!! मैं तो बेवकूफ़ बन गया"

मैं बस इतना ही कह पायी "डॉक्टर साहब, इस देश को ऐसे बेवकूफों की बड़ी जरुरत है"।

सवाल - जवाब का सिलसिला जब थमा,  शाम के साढ़े पाँच बज रहे थे| एक तो कैंसर वार्ड के मरीजों को देख तकलीफ से मन भर गया था| लगभग पाँच साल की एक छोटी बच्ची, जिसे उसके पिता पकड़े हुए थे और माँ साफ़ कर रही थी, वह लगभग कंकाल बन चुकी थी | उसे देखना बेहद भयावह था| उसके माता-पिता को उसे प्यार करते हुए देख न जाने कितनी आँखों का बांध टूटा होगा | जिधर नजर जाए, उधर ही कष्ट| मरीज अधिक, अस्पताल में बिस्तर कम| उन दृश्यों के साथ उस माहौल में रहना भी कम कष्टकर न था|

बारिश थमने का नाम नहीं ले रही थी| हमने जल्दी से ओला कैब बुक किया| दो मिनट बाद फोन आया कि वह नहीं आ सकता और हम बुकिंग कैंसिल कर दें| हमने मना किया पर मज़बूरी में हमें ही बुकिंग कैंसिल करना पड़ा| बिना कैंसिल किए, दूसरा बुक नहीं कर पा रहे थे| पहले लगा बारिश की वज़ह से कैब वाले दिल्ली से उत्तर प्रदेश की ओर नहीं जाना चाह रहे, पर अजीब लगा जब एक के बाद एक पाँच कैब वालों ने मना कर दिया| दफ्तर में फोन लगाया तो उन्होंने कहा "आपलोग न जाने कैसे आएँगे| राम-रहीम के अंधभक्त गदर मचाते हुए दिल्ली और गाज़ियाबाद आ पहुँचे हैं| दफ्तर में सभी को छुट्टी दे दी गयी है"| सुनते ही घबराकर एक पत्रकार को फोन किया, फोन बजता रह गया| फिर फोन आने लगे तो पता चला कि टी सी एस समेत अन्य दफ्तरों ने भी कर्मचारियों को जल्दी छुट्टी दे दी| मेरे पास खड़ी सॉफ्टवेर इंजिनियर के मोबाईल पर बारबार उसकी छोटी बहन का फोन आ रहा था जो अपने दफ्तर का हाल बता रही थी| उसने पहले बताया कि हिंसा खत्म होने का समाचार आने तक उसके दफ्तर से किसी भी कर्मचारी के बाहर जाने पर रोक लगा है| थोड़ी देर बाद फिर से फोन कर उसने बताया कि सरकारी आदेश पाकर उसके दफ्तर को खाली करवाया जा रहा था| दोनों बहनें एक-दूसरे के लिए परेशान थीं|

मायूस सॉफ्टवेर इंजिनियर रह रहकर मुझसे पूछ रही थी "अब क्या होगा मैम" और मैं उसे दिलासा देते हुए कह रही थी "कुछ न कुछ उपाय हो जाएगा" जबकि मैं भी मन ही मन अपने आप से ठीक यही सवाल पूछ रही थी|

एक वाकया याद आया| एकबार मैं और मेरी बेटी, खुशी रूटीन ब्लड टेस्ट के लिए अपोलो गए| साथ में मेरे माँ-बाबा भी थे| पहले उनका रक्त लिया गया, फिर मेरा और फिर खुशी की बारी आयी| खुशी जोर-जोर से रोने लगी| मैं उसे चुप कराने लगी, तो उसने कहा "मुझे दर्द हो रहा है"| मैंने उससे कहा कि सुईं के चुभने पर दर्द तो सभी को होता है; पर और कोई नहीं रो रहा| इसपर उसने पूछा " अगर दर्द हुआ तो क्यूँ नहीं रो रहे"!!! मैं निःशब्द हो गयी| मैंने उससे कहा "हम बड़े होकर बच्चों जैसा सहज नहीं रह पाते| हमारे अंदर कुछ और होता है और बाहर कुछ और| अभिनय की इतनी जबरदस्त आदत पड़ चुकी होती है कि जहाँ उसकी दरकार नहीं, वहाँ भी वही करते हैं| तुम इसबार सही हो, रो लो| "| मेरी छोटी सी बच्ची से एक बड़ा ज्ञान मिला| इस घटना के ठीक नौ महीने बाद अपोलो के लैब में रक्त देते हुए किसी को यह कहानी सुनायी थी| उसने उस दिन अपनी भावनाओं को बहने दिया था| हम कई बार आम कहना चाहते हैं, और अभिमान लिए सामनेवाले से ईमली बतियाकर रह जाते हैं| उस दिन फिर लगा सहज होना बेहद जटिल होता है| सचमुच रोने का मन कर रहा था|

हमने फिर एक कैब बुक किया| इसबार कैब वाले के पूछे जाने पर मैंने पता मयूर विहार के पास का बताया| पहले मना कर गया, पर जब मैंने बताया, मेन रोड में ही उतर जाना है, वह आने को राजी हुआ| ओटिपी डालते ही नॉएडा का पता देख बिफर गया पर मैं उसे यह समझाने में कामयाब रही कि दिल्ली के पास है|

देर रात अक्षरधाम फ्लाईओवर के नीचे जाम में फंसी थी| बाहर घुप्प अंधेरा पसरा हुआ था | वहाँ से नॉएडा - ग्रेटर नॉएडा जाने वाली कतारबद्ध गाड़ियों के टेल-लैंप की लाल रौशनी ऐसी दिख रही थी मानो कई खतरे एक साथ किसी शहर में प्रवेश कर रहे हों | सड़क के दूसरी ओर तेज गति से दौड़ती गाड़ियों के  हेडलैंप से आती दुधिया रौशनी को देखकर लग रहा था कि जैसे वे एक छोर के अंधेरे से भाग दुसरे छोर के अंधेरे की ओर जा रहीं थीं | मैं सोच रही थी कि उजालों के विनिमय में अक्सर अंधेरा हाथ आता है| अचानक गाड़ी में हरकत हुई और गाड़ी आगे बढ़ी| सामने बुद्ध धर्म चक्र मुद्रा में आसीन थे | हम गौतम बुद्ध नगर में प्रवेश कर चुके थे| दफ्तर पहुँचने से पहले वहाँ की ह्यूमन रिसोर्स एग्जीक्यूटिव का फोन आ चुका था और उसने कहा कि हमें दफ्तर पहुँचते ही घर के लिए निकल जाना है| ठीक वैसा ही किया|

बारिश के बाद दक्षिणी दिल्ली की भीड़भाड़ वाली सड़कों को पार कर दफ्तर पहुँचते देर हो गयी| दफ्तर खाली हो चूका था| पार्किंग से कार निकाली और घर की दिशा में चल पड़ी| ज़ेहन में बस एक ही बात थी| किसी तरह जल्द से जल्द घर पहुँचना था | एम्स से मेरे साथ ही दफ्तर पहुँची सॉफ्टवेर इंजिनियर को मैंने उसके घर तक छोड़ने की पेशकश की; पर उसने यह कहते हुए मना कर दिया कि कार की तुलना रिक्शा से जल्द पहुँच जाएगीं|  नॉएडा सेक्टर दो से एक्सप्रेसवे आने में जहाँ ४० मिनट लग जाते हैं, उस रोज़ १० मिनट में पहुँच गयी| रास्ते में ऍफ़ एम् पर अचानक सुना कि गाज़ियाबाद और नॉएडा के सेक्टर 144 में हालात ठीक नहीं| महामाया फ्लाईओवर के पास ऐसा जाम लगा था कि बहुत देर तक कुछ बुरा होने का अंदेशा लिए कार में बैठी रही| जानकारी लेने के लिए एक दोस्त को फोन लगाया| उसे जानकारी तो नहीं थी, पर वह चिंतित हो गया| मेरे घर पहुँचने तक लगातर फोन करता रहा| घर पहुँचते ही पता चला कि मैं जल्दबाजी में फोन का चार्जर दफ्तर भूल आई और यह कि नॉएडा में धारा 144 लागू हो गया !!!

घर आते ही टीवी चलाया और समाचार देखने के लिए एक चैनल पर आनेवाले कार्यक्रम की प्रतीक्षा करने लगी। विज्ञापन आ रहे थे; पहले जोशीना, फिर हेमपुष्पा, फिर रसायन वटी, उसके बाद पतंजलि एलो वेरा.....मैं सोच रही थी जब देश इतना बीमार है, तो खबरें अच्छी कैसे हो सकती थीं| भक्ति को गुंडागर्दी में तब्दील होते देखा| पता चला आनंद विहार में रेल की दो बोगियों को आग के हवाले किया जा चुका था| अलग-अलग जगहों पर बसों में भी तोड़-फोड़ की घटना हुई| बताया जा रहा था कि हिंसा में नुकसान की भरपाई डेरा सच्चा सौदे की संपत्ति जब्त करके की जाएगी| आगे क्या हुआ नहीं पता | सबसे ज्यादा हैरान तो मैं उन स्त्रियों को देखकर थी जो गोद में बच्चों को लिए एक बलात्कार के आरोपी को बचाने सड़क पर उतर आईं थीं| कई लोगों के मारे जाने और कुछ के घायल होने की ख़बरें थीं |

सर में तेज दर्द हो चला था| जिस दहशत भरे माहौल से होकर घर पहुँची थी और ठीक तभी टीवी पर जैसे दृश्य दिखाए जा रहे थे, उसके बाद मन और मस्तिष्क, दोनों  को आराम की सख़्त जरुरत थी| शुक्र था कि वह शुक्रवार था और अगले दो दिन छुट्टियाँ थीं| टीवी बंद किया और बेटी से बातें करने लगी| घर पर होना बेहद सुकून दे रहा था| यह और बात है कि एम्स के कैंसरग्रस्त मरीजों और उनके परिजन के सहमे हुए चेहरे आज भी मेरा पीछा करते हैं| अगले दो दिन आराम किया|

अगले सप्ताह, सोमवार तक स्थिति नियंत्रण में थी, हम उठे, तैयार हुए और फिर दफ्तर चल दिए|