Saturday, April 8, 2017

कष्ट

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सुनो नताशा, 
न करो धारण अपने कष्टों को आभूषणों की तरह 
छुपा लो गड़े खजाने की तरह उन्हें, 
नहीं तो मुश्किल में पड़ोगी

धो डालो यथाशीघ्र अपनी उँगलियों के पोरों पर जमे नक्षत्र-विषाद
नहीं तो जान लो नताशा, आएगा कोई राक्षस भिक्षुक के वेश में 
तुम्हारे कष्टों को तो नहीं ही हरेगा, तुम्हें छल जाएगा 
पौराणिक महाकाव्यों में उल्लेख है ऐसी कहानियों का

ठहरो नताशा, मत उगलो अग्निवर्षा करते शब्दबीज 
जिससे जल जाए तुम्हारे घर का दक्षिण दुआर 
जो संयोगवश प्रवेश द्वार भी है तुम्हारे घर का 
संभलो कि यह तमाशबीन समय है 
जानती तो हो न नताशा,  घर छोड़कर वन को निकली स्त्रियाँ 
भैरवी ही बनती हैं, बुद्ध नहीं बनती कदापि 

याद करो नताशा कि तुम्हारी माँ ने कहा था प्रेम नहीं करना 
कर सीता से यशोधरा तक का उल्लेख, कहा था
अत्यंत सुंदर स्त्रियों के भाग्य में प्रेम नहीं होता  
माँ के मुख से निकली बात किसी मंत्रोच्चार से कम तो नहीं होती नताशा
फिर कौन सा मुँह लेकर कहोगी कि वो जो रिश्ता था, अब रिसता है|

देखो नताशा, तुम्हारी खंडित स्मृतियों की परिक्रमा करता है शब्दयान 
और तुम्हें घेरे बैठी हैं कई दुर्लभ कवितायेँ 
तो करो प्रतिज्ञा कि नहीं पढ़ोगी प्रेम की आयूहीन कविता आजन्म 
हृदयहीन समाज की धिक्कारसभा में 

सुनो नताशा, 
यदि अपने दुखों के रंगों में रंग नील-बसना ही बनना है 
तो आसमान बन जाओ, करो अपने व्यक्तित्व का विस्तार अपरिमित 
किसी की छत बन जाओ, सजा लो कष्टों को बना सूरज, चाँद और तारे 
करो वृष्टि स्नेह की, जब दिल भर आये 

चलो, उठो नताशा, बहुत दूर जाना है 
और देखो आसमान की ओर सर उठाकर, कहीं कोई करुणाधारा नहीं है 
पर याद रहे नताशा,  न करना उल्लेख प्रेम या स्वाधीनता का कभी
कि मानवता की पृष्ठभूमि पर फूटता है कष्ट का झरना इन्हीं दो पर्वतों से 

सुनो नताशा, 
न करो धारण अपने कष्टों को आभूषणों की तरह 
छुपा लो गड़े खजाने की तरह उन्हें, 
नहीं तो मुश्किल में पड़ोगी

Sunday, March 12, 2017

फ़िदा हुसेन का घोड़ा

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अपने ख्वाबों की बदलती ज्यामिति पर
जिसे बन जाना था पाइथोगोरस सा 
और गढ़ने थे जिसे नित्य नए प्रमेय 
मैंने देखा है खुली आँखों से उस शख्स को 
बदलते हुए अनगढ़े ख्वाबों को रंगों में,
फिर उन रंगों को बदलते कैनवास पर 
बिखरी हुई आड़ी-तिरछी लकीरों में,
बदलते देखा है उन लकीरों को फिर 
अलग-अलग ज्यामितीय आकारों में, 
देखा फिर ज्यामितीय आकारों को 
बदलते हुए एक मुकम्मल आकृति में 
देखा है इन आकृतियों को कई बार बनते घोड़ा
कभी रंगीन तो कभी श्वेत-श्याम रंगों में 
और इस प्रकार फ़िदा हुसेन की तूली से गुजरकर 
अनगढ़े ख्वाबों को घोड़ा बन दौड़ते कैनवास पर 
कई बार मैंने देखा है खुली आँखों से

यदि लगता है आपको कि मर गए हैं आपके ख्वाब 
यदि लगता है आपको कि ख्वाब अब बचे ही नहीं 
यदि लगता हो आपको कि ख्वाब जैसा कुछ था ही नहीं कभी 
तो जागकर शून्यता के ध्यान से देखिये फिदा हुसेन के घोड़े को 
जो देखता है मुड़-मुड़ कर पीछे अलग-अलग रंगों में 
आगे बढ़ते हुए क्या देखा है आपने कभी मुड़कर अपने छूटे हुए ख्वाबों को ?

आप देखेंगे कि हमारे अपने ही ख्वाबों का चित्रांतर है फिदा हुसेन का घोड़ा 
जिसे स्पर्श कर पाने के लिए दरकार है अंतर्दृष्टि की 
जिसके शरीर से एक ज्यामितीय आकार निकालकर रख लेना चाहता है मन 
फिदा हुसेन के घोड़े की नाल में दिखता है मस्तुल हमारे ख्वाबों की नौका का

फिदा हुसेन का घोड़ा जो दिखता है कैनवास पर पीछे मुड़कर देखता 
बना है ज्यामितीय आकारों से और हर आकार का है अपना एक कैनवास 
मंचन हो सकता है उस हर एक कैनवास पर हमारी ख्वाबों के पसंद के किसी नाटक का 
जिसे देखकर पता चलता है कि होता है कितना जरूरी ख्वाबों को आकार देना !

हम जब भी देखते हैं कोई ख्वाब, हमें देखना चाहिए फिदा हुसेन के घोड़े को 
जो देखता है मुड़-मुड़ कर पीछे बारबार, आगे दौड़ते हुए भी पूरे सामर्थ्य के साथ 
कि मन को चाहिए होती है अथाह हॉर्स पावर शक्ति आगे बढ़ते रहने के लिए 
और आकार देने के लिए पीछे मुड़ कर देखते हुए अपने छूटे हुए अनगढ़े ख़्वाबों को






Monday, March 6, 2017

बस इक आशा

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गाढ़े नीले रंग की स्याही में है दर्ज़
मस्तिष्क की तंत्रिका कोशिकाओं में तैर रही दमित स्मृतियाँ 
जिन्हें विस्मृत करने के अभ्यास में किए जा रही हूँ कंठस्थ 
अब भी आच्छादित है जिन पर रक्त अक्षत अच्छे दिनों के अनुष्ठान का 

धरने पर है अनुच्चारित शब्दों का जुलूस
ध्वनि के द्वार पर, नीरवता में लीन
कोई जाप या मंत्रोच्चार नहीं, है बस इक आशा 
कि सुनाएगा कभी जीवन पियानो बीथोवन की नाइन्थ सिम्फ़नी

समयपुरुष पोंछ देता है उन तमाम स्नेहसिक्त आँखों की अनुभूतियों को 
जो कर सकता था काम मलहम का मेरी वेदना पर  
अबाध्य मन जा रहा है दंडकारण्य की ओर
है बस इक आशा कि लौट आएगा अच्छे दिनों का प्रवासी पक्षी 

अवकाश पर हैं धरती के समस्त देवी-देवता इन दिनों 
कि विलीन हो जाती हैं समस्त प्रार्थनाएँ निर्वात में 
है बस इक आशा कि आएगा कोई पैगम्बर वक़्त का 
और करवाएगा मेरा साक्षात्कार अच्छे दिनों के देवता से 

Saturday, March 4, 2017

मधुमेह

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लिखा है एक तम्बू के बाहर
शहर के सबसे मशहूर चौराहे पर 
"बंजारों का हिमालय आयुर्वेदिक दवाखाना"
लोगों की भीड़ खड़ी है जिसके बाहर ऐसे 
मानो लगा हो किसी गाँव में मंगल बजार 

सुनती है बंजारन सब्र से मरीज का मर्ज 
फिर देती है जामुन के बीज और आम के पत्तों का चूर्ण 
बताकर दवा साल के पत्तों से बने दोने में 
बताती है ढूँढा था धरती पर बंजारों ने ही सबसे पहले औषधि 
और बंजारों के पास है हर उस मर्ज की दवा 
जिसे शहर के बड़े अस्पताल कहते हैं लाइलाज़ 

ओह! तो बंजारे ही करेंगे कल्याण समस्त मानव जाति का 
और रोग, जिनकी दवाईयों का नहीं चल सका है पता 
वह तमाम औषधियाँ कर रही हैं प्रतीक्षा बंजारों की ?

बँटता है प्रसाद मिश्री और दूध का 
गाँव की शीतला माता मंदिर के बाहर 
बच्चे ग्रहण करते हैं प्रसाद, माता तृप्त होती है 

मधुमेह वह अनाथ है जिसका नहीं है कोई इष्टदेव 
भटकता रहता है जो देह की एक जमीन से दूसरी ज़मीन तक 
बंजारों की ही तरह, बिना भेदभाव किए किसी प्रकार का 

हाय ! वह रुग्ण स्त्री बंजारे की तम्बू में मिश्री की डली छोड़ आई 
उसे  पुकारता है बरगद के नीचे का शीतला माता का मंदिर 

इसके पहले कि उसकी स्नायु में जमता अवसादों का मेघ 
कर दे भावशून्य उसे , वह खेलना चाहती है लुकाछिपी तोते के साथ 
जिसका ठिकाना है आम का वह पेड़, जिसके फल हैं उसे  बेहद प्रिय 
चुराकर अपने ही जीवन से वह रख लेना चाहती है एक प्रेम भरा अपराह्न 
जब चख सके अपना प्रिय फल, तोता चखकर बतायेगा जिसकी मिठास  

ओह ! वह बंजारन के आंचल में सिक्कों जैसे बताशे छोड़ आई 
चीटियाँ भूलने लगीं हैं उसके घर का रास्ता इन दिनों 
और उसकी जुबान की स्मृतियों में फँसा है चाशनी का तार 

कोई कस रहा है तंज, रहने दीजिये, ये बंजारे करेंगे ठीक आपका मधुमेह !!
जो खुद भटकते हैं दर ब दर और जिन्होंने नहीं भरा कभी गृह ऋण की क़िस्त
वो क्या ख़ाक समझेंगे आपका दुःख, कैसे करेंगे आपकी दुःखों का इलाज़ !!

आह ! वह बंजारन की नन्ही बेटी के हाथों में लेमनचूस छोड़ आई 
पर उसके घर में अब भी बचे हैं कुछ शेष उसकी अपनी बेटी के लिए 

कहती है उसकी बेटी, माँ, खाने हैं शक्कर पारे 
रखकर नमक पारे उसकी नन्ही हथेलियों पर 
सुनाती है कहानी राजकुमारी और नमक की 
बदले में मिलती है उसे बेटी की मीठी मुस्कान 

उफ्फ ! वह मंगल बजार में शक्कर छोड़ आई 
फक्कड़ इन्सुलिन गाता है गीत मचलकर 
"मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया"

वह शहर के उस चौराहे पर गुड़ की डली छोड़ आई 
कुतर रही अब बैठ बीते दिनों की मीठी यादों का गजक 

वह गुजर रही है नीम के जंगल से इन दिनों 
नीम अँधेरा है जहां दिन और रात 
नहीं उगता जहाँ केसरभोग सा सूरज 

वह चौराहे से घर तक, हर कदम पर, कुछ रवा चीनी छोड़ आई 
ज़िद्दी स्वाद ने पकड़ रखा है जुबान की मधुर स्मृति का आँचल 
और वह आँचल की ओट से देख रही है मीठे भविष्य का आइना

Wednesday, March 1, 2017

रात

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आएगा प्रकाश
कहता है भोर की ओर देख  
रात का बतास 

शब्द बतास का खिल जाता है बन फूल 
हवा में तैरती है गंध रात की रानी की 
स्वप्न में टिमटिमाता है जुगनू व्याकुल 

अँधेरा खिलखिलाता है 
नींद के कानन में चेतना की जागृति 
स्वप्न की विलासिता है 

दीये की बाती में रात की उदासियाँ जलती हैं 
होता है अंतराल बस एक स्वप्न भर का 
दिन के उजाले में स्वप्न की परियाँ हाथ मलती हैं 

निकल पडूँगी पदयात्रा पर मैं भी साथ
आएँगे जब दिन के उदास देवी-देवता 
और सीख लूँगी एक नए दिन का पाठ 

Sunday, February 26, 2017

पर्वतारोहण

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एक दिन बना लूँगी मैं अपना ठिकाना
किसी हरे-भरे पहाड़ पर  
ढूँढते हुए आस्ताना 

फिर एक दिन तपस्या में लीन आदिम पुरुष सा पहाड़  
माँगेगा मुझसे आश्रय, बन प्रणय भिक्षुक 
और प्रतिदान में चाहूँगी मैं अभयदान 
तब हमारे प्रणय अभ्यास का फल 
लेगी जन्म हमारी नैसर्गिग संतान, बन वितस्ता सी कोई नदी 

उस दिन करते हुए हमारा अनुसरण 
अपने अमरत्व के लिए 
बहुत-बहुत लोग करेंगे पर्वतारोहण 

तपस्या कर रहा है पहाड़ अनंतकाल से कि आएगा माहेन्द्र-क्षण
दे रही है आहुति कालिंदी, इक्षुला, तमसा जैसी नदियाँ इस अनुष्ठान में 
मंत्रोच्चार कर रहे है हिलाकर पत्तों को सनोबर और देवदार के वृक्ष  
मैं ढूँढ रही हूँ सूत्र पहाड़ को पिघलाने का !

दुविधा में है भगीरथ का समयपुरुष !!

Thursday, February 23, 2017

इंसान होना रह गया

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हुए सबसे पहले हम नर और नारी, श्वेत और अश्वेत  
हम हुए फिर हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख और इसाई 
दिमाग लगाया तो हम दलित और सवर्ण भी हुए 
और इन्हीं झंझटों के बीच हमारा इंसान होना रह गया 

जब हम बढ़े आगे और की हमने खूब तरक्की 
तो हम हुए अमीर और गरीब, सुखी और दुखी 
हम शिक्षित और निरक्षर, विद्वान् और मुर्ख हुए 
और इन्हीं झंझटों के बीच हमारा इंसान होना रह गया 

समय के साथ किया हमने प्रवेश जब विज्ञान के युग में  
तो हुए हम आस्तिक और नास्तिक, प्रगतिशील और पिछड़े 
हम हुए वामपंथी और दक्षिणपंथी, मूक और वाचाल 
और इन्हीं झंझटों के बीच हमारा इंसान होना रह गया 

हम भगवान् तक बन गए जब हुए "ईसा मसीह" और "बिरसा मुंडा" 
संत भी बन गए होकर रैदास, नानक, कबीर, फरीद और मीरा
वीर बने "शिवाजी", "भगत" होकर, बने आदर्श बन स्वामीजी और बापू
और इन्हीं झंझटों के बीच हमारा इंसान होना रह गया 

पढ़ा हमने गीता, कुरआन,  गुरुग्रंथ साहिब और बाइबिल, तो बने हम धार्मिक 
वैज्ञानिक बने पढ़कर भौतिकी, जीव विज्ञान, रसायन और वनस्पति शास्त्र 
राजनीति पढ़ नेता बने, हुए कलाविद पढ़ कला की तमाम विधाएँ 
और इन्हीं झंझटों के बीच हमारा इंसान होना रह गया 

कितना हो पाए सामाजिक, हम समाज शास्त्र पढ़कर ही 
जोड़ पाता जो समाज को, बनने के पहले ही पुल वो ढह गया 
पढ़कर रामायण हम ढूँढ रहे हैं सदियों से स्वर्ग जाने की सीढ़ी 
और ऐसे ही तमाम झंझटों के बीच हमारा इंसान होना रह गया